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नहीं बचाया जा सका 80 साल का कछुआ, 12 दिन पहले घायल रूप में आया था

7 वर्ष पहले
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बिलासपुर. कटघोरा के पोड़ी गांव के खेतों में लहूलुहान हालत में मिले 80 वर्ष के मादा कछुए की मंगलवार को कानन पेंडारी स्माॅल जू में मौत हो गई। उसे बचाने की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुईं। ग्रामीणों ने मांस के चक्कर में उसकी पीठ पर टांगी मार-मार कर हड्डियां तोड़ डाली थीं। कछुए के हमलावरों का सुराग नहीं मिल सका है।

कानन जू के चिकित्सक पीके चंदन ने मादा कछुए को बचाने की कोशिशें की, लेकिन सफलता नहीं मिली। वन परिक्षेत्राधिकारी टीआर जायसवाल के मुताबिक पोस्टमाॅर्टम के दौरान उसके सिर के पास से आठ किलो खून का थक्का निकला। इससे स्पष्ट है कि उस पर बड़ी बेरहमी से वार किए गए थे। कछुआ शेड्यूल-1 के अंतर्गत संरक्षित श्रेणी में आता है। घायल कछुए को 4 सितंबर को कानन के रेस्क्यू सेंटर में लाया गया था, जहां 12 दिन जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हुए उसने दम तोड़ दिया।
9 बजे तैर रहा था, 10 बजे बेजान हुआ शरीर
मादा कछुए का वजन 60 किलो था। सुबह 9 बजे वह तालाब में तैरते मिला था, लेकिन 10 बजे दोबारा उसका जायजा लिया गया तो उसका बेजान शरीर सतह पर मिला। वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत कछुए का शव आरके गजभिए व स्टाफ की मौजूदगी में जला दिया गया। कानन में बड़े आकार के घायल कछुए को लाए जाने के बाद सैलानियों में उसके प्रति खास आकर्षण था। संभागायुक्त सोनमणि बोरा ने जू के निरीक्षण के दौरान उसकी खासतौर पर देखभाल करने के निर्देश दिए थे।