पच्चीस बछर के होगे उड़ान...
लोक नाचा
आज हमर समाज पच्छिमी रीत-रिवाज अऊ रहन-सहन के अतेक मिलावटी असर परे हे के लोगन आेखर ले उबर नइ पावत हावय। जेला पाथे ओला देखथे अऊ सुनथे। जेकर असर अंधरा अइसन ओखर पिछलग्गू हो गय हावय। अंधरा मन असन भटकत रद्दा रेंगत हे। लोगन अपन जिनगी के रहन-सहन अऊ कायदा के कउनो खियाल नई ए। उनला ये नइ जनात हे के जउन अपन समाज के अदब-आचार-बिचार अऊ तरीक्का भुला जाथे, मतलब अपने आप भुला जाथे। लोगन के अइसे अंधरा मन कस रेंगाई के सेती हमार छत्तीसगढ़िया घलाव मन अपन संस्कीरती अऊ जिनगी के रंग-ढंग भुलाय असन करत हे।
लोक संस्कीरती, लोककला, लोकभाखा के चिन्ता लेके डॉ. सोमनाथ यादव आज ले सवा कोरी बछर पहिली बिलासा कला मंच के मुनियाद धरे रहिस। अइसे लगत हे काले परसो ये बात आय फेर अब तो पचीस बछर हो गय हे बिलासा महोत्सव ल। नंदिया के लहरा कस अबड़ उतार-चढ़ाव देखे हे ये महोत्सव ह। जूना बिलासपुर जिहां दाई बेलसिया जनमे रहिस, ओखरे छाँह अऊ अरपा नंदिया के कगरा एक लइका बेलासा दाई जेकर नाम ले बेलासपुर बसीस, जउन बखत-बेरा के नहके ले बेलासपुर ले बिलासपुर हो गईस, बिलासा कला मंच के नाम ले एक संस्था बनाईस। उन्नइस बछर के लइकई उमर मंच बनात बेरा नइ सोचे रहिस होहय के ये लइकई खेल बनाय मंच अतका सरलग बाढ़ जाही जेमा एक महा उत्सव बिलासा महोत्सव होही, जउन सहर नइ भलुक छत्तीसगढ़ राज अउ देस अपन नाव कमाही। दू बछर पहिली बिलासा कला मंच के रजत जयंती मनाय गय रहिस अब ये बछर 2015 बिलासा महोत्सव के रजत जयंती मनाय जावत हे।
बिलासा महोत्सव लोक संस्कीरती, लोककला, लाेकभाखा बचाय बर अन्तस ले बचन धरे हावय। अरपा के कगरा, अमरईया के छाँह बाढ़े उनखर गांव-गंवई के संस्कीरती के सपना सुफल होके पहार के फुलगी छुअत हे।
बिलासा महोत्सव के पचीस बछर के बिन थके अऊ ओखर दिन-दिन के बढ़ाई पुरातन पोथी-पतरा अस साखी हावय। छत्तीसगढ़ राज बने के पहिली जउन सांस्कीरतिक संस्था मन अन्तस के गियान अऊ जनजागरन के बूता निसुवारथ ढंग ले करिन तेमा बिलासा महोत्सव घलाव के पोसन अऊ योगदान रहिस। छत्तीसगढ़ के कई ठन मंच नवा अऊ जुन्ना लोक कलाकार मन लोकमंच दिहिस जेखर ले लोककलाकार मन देस-बिदेस कीरती के धजा गाड़िन। ऐही परमपरा के बिवहार बिलासा महोत्सव करके छत्तीसगढ़ के मान करे अघुवा साबित होय हे।
बिलासा महोत्सव लोकला, लोकसाहित अऊ गांव-गंवई के भाखा के साधक मन ओसपीपारी बिलासा लोककला अऊ साहित सनमान ले सिंगारत हे। ऐमा नवा अऊ जुन्ना सभो कलाकार लिखईया मन मिंझार के ये सनमान के महत्तम खड़ा करे हे। ऐखरे संगे-संग समाजसेवा बर जउन हर बखत ठाढ़े रहिथे तउन मनइखे के बिलासा समाज सेवा सनमान घलाव करत देखे गए हे।
बिलासा महोत्सव महोत्सव के रूप-बरन देखईया मन दिए हांवय। इनखर बाढ़त भीड़ अऊ उछाह-उमंग के सेती इहाँ खाई खजेना के मेला-ठेला अपन मन के लग जाथे।
ये महोत्सव के खास बात ऐही हावय के ऐला देखईया मन खुदे जाथे अउ कायदा रहिके अपन संग महोत्सव के मरजाद रखथें। कउनो पुलुस बिवस्था के घलाव के ये लोगन मन समरपित कार्यक्रम निपट जाथे। ये महोत्सव एकठन आऊ खास बात ये आय के ऐला लोगन सालभर अगोरत रथें सबझिन ऐला अपन समझथें।
बिलासा महोत्सव समरपित दल भावना ले दउड़त-बढ़त हे। जेमा लोककला के जनईया, साहित मनीसी, साहितकार और भाखा गियानी के देखाय रद्दा के संग नवा उतसाही जवान के जुराव ले महोत्सव निपटथे। बिलासा महोत्सव पन्द्रा बछर ले लोककला और लोकसाहित विसय संगोस्ठी घलाव कराय हावय। जेखर ले लोककला अऊ लोक संस्कीरती देखईया-सुनईया मन चिन्ह सकय। लोकसाहित के परचार बर एक घव नौ दिन के पुस्तक मेला के आयोजन ये महोत्सव के महातम जुरे हे।
छत्तीसगढ़ी लोककलाकार मन मंद पियई और बिभचार ले दूरिहा रखे के कोसिस घलाव ये महोत्सव अपन हद रहिके करे हावय। परमपरिक पहिनावा, गहना, बाजा और नाच प्रस्तुत करे बर कउनो किसम के समझउता नइ करे हावय। बेढंगा, फूहड़ और अनफबन एक हद तक हरवाय के नजर ले बिलासा महोत्सव के सफा सादा सोच सुवागत के लाइक हावय।
कउनो महोत्सव एकोठन कलंक मुड़ी मढ़ाये बिन पचीस बछर ले रेंगत-दउड़त है तव ये ओखर जंगरैत होय के निसानी आय। बिलासा महोत्सव नजर ले परखे के महत्तम हे। बिलासा महोत्सव बिलासपुर के बैभव आय, छत्तीसगढ़ राज के धरोहर आय जउन देस के मुड़ी उठाय बर दिनरात सरलग जांगर पेरत हे।
बिलासा
महोत्सव