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गरीबों के लिए बने कानून कागजी, नहीं हो रहा अमल
कमाई पर बट्टा नहीं चाहते हैं स्कूल
निजीस्कूल प्रबंधन किसी हाल में नहीं चाहते कि यह अधिनियम लागू हो। शहर के सरकारी प्राथमिक स्कूलों में छात्रों की के बराबर है। हर अभिभावक आज के दौर में अपने बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला दिलाता है। निजी स्कूल भी इस बात का जमकर फायदा उठा रहे हैं। सरकारी स्कूलों के मुकाबले उनकी फीस सौ गुना ज्यादा होती है। इसके अलावा यूनिफाॅर्म, टाई-बेल्ट, जूते-मोजे, किताब-कॉपी आदि चीजें भी स्कूल ही तय करता है कि अभिभावक इनकी खरीदी किस दुकान से करेंगे। आरोप आम है कि इन सबके पीछे स्कूल प्रबंधन को कमीशन मिलता है। अधिनियम लागू होने से छात्रों की संख्या के 25 फीसदी बच्चों को मुफ्त शिक्षा देनी पड़ेगी, जिससे स्कूलों की कमाई में कटौती होगी।
डीबी स्टार | बिलासपुर
शहरऔर आस-पास के स्कूलों में शिक्षा का अधिकार अधिनियम मजाक बनकर रह गया है। गरीब और निचले वर्ग के लिए बने इस अधिनियम का पालन कराना अधिकारियों के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। यही वजह है कि सरकार के निर्देशों के बाद स्कूल प्रबंधन मनमानी पर आमादा हैं और प्राथमिक स्कूलों में 25 फीसदी गरीब पिछड़े वर्ग के बच्चों को मुफ्त अनिवार्य शिक्षा नहीं मिल पा रही है। शिक्षा विभाग के जिम्मेदार इसकी अनदेखी कर रहे हैं और निजी स्कूलें मनमाना फीस वसूल रही है। इससे इनके कामकाज का स्तर समझा जा सकता है।
सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम बने पांच साल होने को हैं, लेकिन स्कूल प्रबंधन इसे अपनाने में आनाकानी कर रहा है। इसके तहत निचले तबके पिछड़े वर्ग के बच्चों को फ्री में अनिवार्य शिक्षा नहीं मिल रही है। वर्ष 2009 के दौरान बनाए गए इस अधिनियम की शहर में स्थिति है कि इसे अनुदान प्राप्त निजी स्कूलेंं अमल में नहीं लाना चाह रही है। जबकि एडमिशन के बाद इन्हें बच्चों को कॉपी-पुस्तकें, सामान और यूनिफार्म वितरण करना है। वे किसी भी तरह का इस अधिनियम मानने के लिए तैयार नहीं हैं। अफसरों को इस ओर ध्यान आवश्यक है।
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