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गुटबाजी को रणनीति बताती रही कांग्रेस, जबकि हर चुनाव में नामांकन से ठीक पहले कैंडिडेट तय होते हैं
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कांग्रेसमें हर चुनाव में नामांकन से चंद घंटे पहले कैंडिडेट डिक्लीयर करने की परंपरा रही है। ऐसा गुटबाजी के चलते होता है, हालांकि इस बार पार्टी इसे रणनीति का हिस्सा बता रही है। यह सभी को पता है कि पार्टी में आंतरिक गुटबाजी के चलते जूतमपैजार की नौबत तक चुकी है और तीन दिनों से जमकर घमासान मचा है। हालात इतने बिगड़ गए कि कई जगहों से इस्तीफे का दौर शुरू हो गया। इधर, नामांकन की अंतिम तारीख से ठीक एक दिन पहले यानी रविवार रात बिलासपुर नगर निगम के मेयर के लिए रामशरण यादव के नाम की घोषणा हुई तो देर रात पार्षद पद के दावेदारों की लिस्ट फाइनल हो सकी।
धान खरीदी नीति नसबंदी कांड के विरोध में किए गए आंदोलन का लाभ नगरीय निकाय चुनाव में लेने का दावा करने वाली पार्टी आंतरिक कलह से नहीं उबर पा रही है। प्रत्याशी चयन लेकर छिड़ा विवाद शांत नहीं हो रहा है और अभी भी जोगी बघेल गुट आमने-सामने हैं। नाराजगी दोनों खेमों में है और बगावत के सुर भी। ऐसे में बिलासपुर मेयर के प्रत्याशी का टिकट अंतिम समय तक फंसा रह गया है, बाकी प्रत्याशियों के नामों की घोषणा भी रोक दी गई थी। गुरुवार रात जब रायपुर स्थित कांग्रेस भवन में जूतमपैजार की नौबत बनी तो प्रत्याशी चयन की गेंद केंद्रीय नेताओं के पाले में डाल दी गई। इधर, जिन दावेदारों का टिकट तय है, उन्हें भी भरोसा नहीं हो पा रहा है। वे कह रहे हैं कि कांग्रेस में कुछ भी हो सकता है। ऐन वक्त प्रत्याशी बदल दिया जाता है। ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनाव में आशीष सिंह ठाकुर को बिलासपुर सांसद प्रत्याशी बना दिया गया था, लेकिन ऐन समय पर बी फॉर्म पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की प|ी डाॅ. रेणु जोगी को दे दिया गया। गौरतलब है कि दिसंबर 2009 में भी भाजपा ने 3 दिसंबर को प्रत्याशी घोषित कर दिए थे, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी ऐन वक्त फाइनल हुए। वोटिंग 23 दिसंबर को हुई थी। यही हाल बीते विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी रहा।
इन मेयरों का चुनाव एक साल के लिए हुआ
मेयर का नाम कुल कार्यकाल
ई.अशोक राव, कांग्रेस 5-9-1983 से 4-9-1984
बलराम सिंह ठाकुर, कांग्रेस 5-9-1984 से 4-9-1985
श्रीकुमार अग्रवाल, कांग्रेस 5-9-1985 से 4-9-