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आधुनिक द्रोणाचार्य ने नि:शक्त शिष्य को बनाया धनुर्धर

6 वर्ष पहले
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गुरु-शिष्यपरंपरा की मिसाल मुंगेली जिले के पथरिया ब्लॉक में देखने को मिल रही है। विकासखंड के ग्राम सोढ़ी मराठी के धर्मेंद्र मांडले शिक्षाकर्मी हैं। आर्चरी में बेहतरीन प्रदर्शन ने उन्हें अर्जुन अवाॅर्ड तक पहुंचाया। रायपुर में हुए एक अन्य अवॉर्ड समारोह में बात उठी कि विकलांगों को आर्चरी की ओर ध्यान देना चाहिए। इसके बाद धर्मेंद्र ने ऐसे नि:शक्त युवा की तलाश की जिसमें कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो। उनकी तलाश वर्ष 2011 में पथरिया के बस स्टैंड पर खत्म हुई। वहां पर उन्हें ग्राम भरेवा का सत्येंद्र कुमार मिला। धर्मेंद्र ने पहले उसका मन टटोला, फिर तीरंदाजी में निशाना साधने तैयार कर लिया। धर्मेंद्र ने देसी धनुष-बाण से अभ्यास शुरू करवाया। उसी साल महाराष्ट्र के सतारा में राष्ट्रीय अार्चरी स्पर्धा में सत्येंद्र को प्रदेश का प्रतिनिधित्व का अवसर मिला। शेषपेज|17

इसकेबाद गुरु ने शिष्य को पैरा एशियन गेम्स के लिए ट्रेनिंग दी।

हालांकि इसके पहले सत्येंद्र के लिए आर्चरी यानी तीरंदाजी शब्द नया था। वह अपने गांव भरेवा गया और कुछ पढ़े-लिखे युवाओं से इस बारे में बात की। कुछ ने साफ कह दिया कि ऐसे ही कोई किसी को विदेश क्यों पहुंचाएगा।

नसीहत मिली कि कहीं शहर में ले जाकर बेच आएगा, तुम उसके झांसे में मत आओ। गांव का ही एक युवक धर्मेंद्र के बारे में जानता था। उसने सत्येंद्र को बताया कि वह अच्छा तीरंदाज है और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुका है। इस बात ने सत्येंद्र को हौसला बढ़ाया और वह धर्मेंद्र के गांव सोढ़ी मराठी पहुंच गया। वहां पर धर्मेंद्र अभ्यास में जुटा था। उसके साथ गांव के कुछ किशोर और युवा भी थे। सत्येंद्र पहुंचा तो धर्मेंद्र भी खुश हुआ। इसके बाद शुरू हुआ तीरंदाजी विधा की शिक्षा का पाठ। जितनी शिद्दत धर्मेंद्र ने दिखाई उतने उत्साह से सत्येंद्र ने प्रशिक्षण लिया। चंद महीने में ही सत्येंद्र ने तीरंदाजी में महारत हासिल कर ली।

दुनिया के दूसरे देशों में होने वाले कॉम्पटीशन में उतरने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा था, आर्चरी का वह सामान जिसे खरीद पाना तो सत्येंद्र और ही उनके गुरु धर्मेंद्र के वश में था। धर्मेंद्र शिक्षाकर्मी हैं। उतनी तनख्वाह नहीं मिलती थी कि वे कंपाउंड यानी आधुनिक धनुष-बाण खरीदकर सत्येंद्र को दे सकें। कंपाउंड, तीर अन्य सामान मिलाकर दो लाख रुपए खर्च बैठ रहा था। ऐसे में धर्मेंद्र ने बैंक से एक लाख रुपए लोन लिया तो कुछ पैसे इधर-उधर से जुगाड़कर कंपाउंड खरीदकर सत्येंद्र को अभ्यास शुरू करवाया। सत्येंद्र ने चार साल की कड़ी मेहनत की बदौलत दक्षिण कोरिया में अक्टूबर 2014 में हुए पैरा एशियन गेम्स में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व किया।

सतारा से शुरुआत कर इंचियान तक का सफर

सत्येंद्रने वर्ष 2011 में महाराष्ट्र के सतारा में हुई राष्ट्रीय स्पर्धा में चौथी रैंक हासिल की। अप्रैल 2012 में पुणे की प्रतियोगिता में शीर्ष तीन में जगह बनाई। 2014 में पैरा एशियन गेम्स के लिए दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में सिलेक्शन ट्रायल हुआ। दूसरे स्थान पर आने के बाद सत्येंद्र का चयन दक्षिण कोरिया के इंचियान शहर में होने वाले पैरा एशियन गेम्स के लिए हुआ। प्रतियोगिता 18 से 24 अक्टूबर 2014 के बीच हुई।

गुरु धर्मेंद्र के मार्गदर्शन में निशाना साधता शिष्य।

सत्येंद्र इस तरह कुर्सी पर बैठकर रोजाना साथी तीरंदाजों के साथ अभ्यास करते हैं।

मेहनत रंग लाई