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छात्रों ने पानी के प्रबंधन की तकनीक सुझाई
वाटर-वाटरएवरीवेयर, इफ ओनली वी शेयर हैडिंग के साथ प्रस्तुत शहर के भारत माता अंग्रेजी माध्यम स्कूल का प्रोजेक्ट अर्थियन 2014 में टॉप 20 में जगह बनाने में कामयाब रहा है। वाटर एंड सस्टेनेबिलिटी विषय पर देशभर के 3500 से ज्यादा स्कूलों ने प्रोजेक्ट प्रस्तुत किए थे। इसके तहत स्कूल में पानी का बेहतर प्रबंधन का उपाय बताना था। पांच छात्रों की टीम ने तीन महीने मेहनत और स्टडी से प्रोजेक्ट तैयार किया था। अगले सप्ताह बेंगलुरू में होने वाले समारोह में टीम को पुरस्कृत किया जाएगा।
पानी जीवन के लिए सबसे जरूरी है। अमूमन हमारे सभी कामों में पानी की जरूरत पड़ती है। बहुत कम लोगों को पता है कि विश्व में पानी की निश्चित मात्रा उपलब्ध है, इसमें से मीठा यानी पीने के लायक महज तीन फीसदी है। दुनियाभर के लोग पानी से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। पिछले साल उत्तराखंड में बाढ़ से विनाश हो गया था, उसी दौरान देश के कई राज्यों को सूखे का सामना करना पड़ा। लखनऊ के पर्यावरण शिक्षण केंद्र ने अर्थियन 2014 में वाटर एंड सस्टेनेबिलिटी विषय पर देशभर के स्कूलों से प्रोजेक्ट मंगवाए थे। इसके लिए शहर के भारत माता अंग्रेजी माध्यम स्कूल की टीम ने भी अपना प्रोजेक्ट भेजा था। इसका चयन टॉप 20 में हुआ है। टीम में शामिल पांच छात्रों और उनके गाइड टीचर को बेंगलुरू बुलवाया गया है। वहां अगले सप्ताह होने वाले समारोह में टीम को पुरस्कार दिया जाएगा।
भारत माता स्कूल के बच्चों ने तीन महीने तक पानी प्रबंधन पर रिसर्च किया।
स्कूल की टीम में शामिल देवोप्रियो गांगुली, सौमिक करमाकर, उत्तम तंबोली, मानस खेड़कर और दीपक यादव ने शिक्षक पानू हालदार के मार्गदर्शन में तीन महीने तक पानी की उपलब्धता और खपत पर अध्ययन किया। छात्रों ने निष्कर्ष निकाला कि बेहतर प्रबंधन और जागरूकता से पानी की खपत आधी से भी कम की जा सकती है।
देखाकहां, कितने पानी का होता है उपयोग
स्टूडेंट्सने छात्रों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों पर पानी की खपत, अन्य जगहों पर उपयोग होने वाले पानी की मात्रा और उसे बचाने के उपायों पर अध्ययन किया। इस दौरान जानकारी मिली कि छात्र हाथ धोने के दौरान सबसे ज्यादा पानी का उपयोग करते हैं। इसी तरह बाथरूम, फर्श धोने, गार्डन और टंकी में रिसाव से भी पानी की बड़ी मात्रा खप जाती है।