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इतिहास बिखरा पड़ा है शहर में, हैरिटेज भवनों को सहेजने जिम्मेदारों के पास प्लानिंग है, फुर्सत

7 वर्ष पहले
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{ स्थापत्य कला के नायाब नमूने और उस कालखंड की तस्वीर हैं ये धरोहरें

सूर्यकांतचतुर्वेदी | बिलासपुर

शहरका इतिहास बिखरा पड़ा है। सदी पुराने भवन जर्जर हालात में पहुंच गए हैं। एक टाउन हॉल ही क्यों, राघवेंद्र राव सभा भवन, लेडीज गार्डन, बाल मंदिर, गोल बाजार, जयस्तंभ, पुत्रीशाला जैसी धरोहरों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इन धरोहरों में स्थापत्य कला के नायाब नमूने और उस कालखंड की तस्वीर हैं। लेकिन तो नगर निगम या जिला प्रशासन और ही पुरातत्व विभाग को इनकी कद्र है। एक जमाने में टाउन हाॅल शहर की सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था, तो राघवेंद्र भवन राजनीतिक गतिविधियों का। ये सारे भवन अपनी हालत पर आंसू बहा रहे हैं। नगर निगम की इच्छाशक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब चार साल पहले टाउन हॉल को हैरिटेज बिल्डिंग बनाने के लिए फाइल चली, लेकिन यह टेबलों से नहीं उबर सकी।

सवाल यह नहीं कि इन धरोहर भवनों को अंग्रेजों ने बनवाया था या फिर आजादी के दौर के मालगुजारों ने। सवाल यह है कि हम इन्हें बिना सहेजे कैसे नौनिहालों को बताएंगे कि हमारा इतिहास क्या था? जयपुर, औरंगाबाद, दिल्ली, अमृतसर, चंडीगढ़ समेत देश-दुनिया में कई शहर ऐसे हैं, जो इतिहास और ऐतिहासिक भवनों को सहेज-संवारकर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। शहर में भी दशकों पुराने भवनों को संवारने के लिए इस तरह की शुरुआत की जरूरत है। वह समय रहते, ताकि इन भवनों का अस्तित्व खत्म होने से बचाया जा सके। शेषपेज|15



जीवनके 70 बसंत देख चुके बुजुर्ग और इतिहासविद् अपनी यादों के झरोखे से बताते हैं कि उस दौर में इन भवनों का वैभव अलग ही था। इन इमारतों को बचाकर, संवारकर रखने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी शहर के ऐतिहासिक पहलू से रूबरू हो सके।



ये हैं शहर की विरासत

1902 में बना टी. देहनकर कन्या पुत्री शाला भवन तिलक नगर

1923-31 में बना नार्मल स्कूल

1947 में बना राघवेंद्र राव सभा भवन

1937 में बना लेडीज गार्डन, बृहस्पति बाजार के पीछे

1933 में बना जयस्तंभ, शनिचरी बाजार

1937 में बना गोल बाजार

1930 के दशक में बना तोरवा पॉवर हाउस

झंडा फहराने के बाद यहां की मिट्‌टी ले गए थे दिल्ली

अंग्रेजोंके जमाने में टाउन हाॅल शहर की सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी था। चौथे, पांचवें दशक मे