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आरक्षण से बीवियों ने जीते चुनाव, लेकिन शौहर काम संभालते रहे...
प्रदेशमें नगरीय निकायों के चुनाव के लिए विभिन्न वर्गों का आरक्षण घोषित हो चुका है। इस बार भी 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए रिजर्व हैं। सरकार ये मानकर बैठी है कि इस तरह से महिलाओं काे उनका हक मिल गया है। हालांकि समाजशास्त्री और प्रबुद्धजन कह रहे हैं कि आरक्षण मिला तो, लेकिन निर्वाचित होने के बाद पार्षद बनी गृहिणियां नहीं पति उनके नाम पर नेतागिरी कर रहे हैं। यूं कहें कि पार्षद महिलाएं हैं और पद दायित्व उनके शौहर संभाल रहे हैं। दरअसल, आरक्षण से स्टेटस बदलने के बाद अपने वार्ड के चुनाव में सीधे भागीदारी से वंचित नेताओं ने प|ी, सगे-संबंधियों को चुनाव लड़वाना शुरू कर दिया। पति अपनी पहचान बरकरार रखने पार्षद प|ियों के लेटरपैड पर उनके साथ अपना नाम जुड़वाने जैसे हथकंडे अपना रहे हैं। नतीजा यह कि पार्षद मैडम चूल्हा-चौका संभालती हैं और पति अघोषित तौर पर उनकी सत्ता। इस बार भी तस्वीर कुछ वैसी ही उभर रही है।
आरक्षण के चलते पेशेवर नेत्रियों को छोड़कर चूल्हे-चौके में जुटी रहने वाली गृहिणियां पार्षद और एमआईसी तक तो पहुंच गईं, लेकिन उनका सारा काम शौहर ही संभालते रहे। ये हालात किसी ग्राम पंचायत से लेकर नगर पंचायत और बिलासपुर नगर निगम तक में समान रूप से बने हुए हैं। शेषपेज|16
पार्षदपतियों के हावी होने और निकायों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की शिकायतें मंत्रालय तक जा पहुंचने लगी हैं। नतीजतन शासन को निर्वाचित महिला पदाधिकारियों के कामकाज, संचालन में उनके सगे-संबंधियों के हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगाने के आदेश जारी करने पड़े। इसके बाद भी पार्षद पतियों की दखलंदाजी कम होती नहीं दिखी। प्रमाण हैं, वे लैटरपैड जिनमें पार्षद प|ी के नाम के आगे पति का नाम है। शासन ने इस पर संज्ञान नहीं लिया और ही किसी महिला पार्षद के खिलाफ कार्रवाई की। इधर, गड़बड़ियों के मामले में प|ियां ही कार्रवाई की भेंट चढ़ती हैं।
लैटरपैड पर पति हो गए पीछे
समाज का नजरिया रहा है कि पति परमेश्वर और उसका स्थान प|ी से पहले है। यही वजह है कि आमतौर पर किसी भी दस्तावेज में पति का नाम पहले लिखा जाता है, लेकिन जनप्रतिनिधि चुनी गईं महिलाओं का नाम पहले, फिर पति का नाम और फिर सरनेम लिखा होता है।
धनेश दिवाकर
पंचायतों में महिला आरक्षण का और बुरा हश्र
शहरके वार्डों में तो गाहे-बगाहे महिला पार्षद जनता