वन चेतना केंद्र स्टूडेंट को तरसे
500 स्टूडेंट्स को प्रति वर्ष ट्रेनिंग का टारगेट
छात्र-छात्राओं को वन एवं पर्यावरण के महत्व कोे समझाने के उद्देश्य से प्रदेश के विभिन्न वन मंडलों में लाखों रुपए की लागत से स्थापित वन चेतना केंद्र स्टूडेंट्स के कैंपों के लिए तरस रहे हैं। शासन की अहम योजना माॅनिटरिंग के अभाव में नकारा साबित हो रही है। नेचर कैंप अपनी स्थापना के असली मकसद में नाकाम हो चुका है और महंगे टेंट, ग्लास हाउस महज सैर-सपाटे के स्थान के रूप में सिमट कर रह गए हैं। ‘दैनिक भास्कर’ ने वन चेतना केंद्र में स्टूडेंट के कैंपों के बारे में पड़ताल की तो 2 वन मंडलों में एक भी कैंप नहीं लगने का खुलासा हुआ। कुछ को तो केंद्र के वास्तविक उद्देश्य की भी जानकारी नहीं थी।
छत्तीसगढ़ में वन विभाग ने वर्ष 2013-14 में चुनिंदा वन मंडलों में वन चेतना केंद्र की स्थापना के लिए 45-45 लाख रुपए स्वीकृत किए थे। वन व वन्यप्राणियों के संरक्षण के प्रति भावी पीढ़ी को जागरूक करने के खास मकसद से प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक वन मंडलों में ये केंद्र बनाए गए। इसमें बिलासपुर वन वृत्त के अंतर्गत बिलासपुर और कटघोरा वन मंडल भी शामिल हैं। इसका काफी प्रचार-प्रसार हुआ। बावजूद इसके शासन की मंशा पूरी नहीं हुई। बिलासपुर वन वृत्त के दो वन मंडलों में तो स्टूडेंट्स का एक भी कैंप नहीं लग पाया। भारी-भरकम खर्चे से स्थापित इन केंद्रों के रखरखाव और संचालक, वन प्रबंधन समितियों का खर्च निकालने के लिए अब इनका इस्तेमाल आम लोगों की सैर-सपाटे के लिए हो रहा है।
पर्यटकों के रुकने के लिए खोंद्रा में 32 लाख की लागत से नेचर कैंप बनाया गया है, जहां सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं हैं।
कहां, कितना खर्च हुआ
स्थान स्वीकृत राशि
खोंद्रा 30 लाख
बुका 47 लाख
चैतुरगढ़ 46.62 लाख
महंगे टेंट में आलीशान होटल सी सहूलियत
स्टूडेंट्स को 3 दिनों तक कैंप करने के लिए वन चेतना केंद्र या पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र के अंतर्गत महंगे टेंट लगाए गए हैं। इनके अंदर आलीशान होटल की तरह शौचालय, बाथरूम और सोलर ऊर्जा से संचालित पंखे, लाइट आदि लगाए गए हैं। बुका (कटघोरा) में सूर्योदय का खूबसूरत नजारा दिखाने के लिए ग्लास हाउस का निर्माण किया गया है। प्रकृति के करीब पहुंचाने के लिए यहां बिजली के बजाय सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है। खाना भी लकड़ियों से पकाया जाता है।
सुविधाएं बढ़ाने की जा रही है प्लानिंग
महकमे की योजना का बेहतर ढंग से क्रियान्वयन किया जाएगा। खोंद्रा में ग्रास लैंड व नाले में निरंतर बहाव रखने, बुका में मोटर बोट की संख्या बढ़ाने की योजना है। कैंपों में रियायती दरों पर भोजन व रहवास की सुविधा उपलब्ध कराने की प्लानिंग की जा रही है। नेचर कैंप को आम लोगों की पहुंच में लाने, स्टूडेंट को ट्रेनिंग दिलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।’’ -बी आनंद बाबू, मुख्य वन संरक्षक
नेचर कैंप की स्थापना छात्र-छात्राओं को पर्यावरण व वनों के महत्व से अवगत कराने और उनमें प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन के प्रति रुचि जागृत करने के लिए की गई है। योजना के अंतर्गत कक्षा 9वीं से 12वीं के विद्यार्थियों को 3 दिन के कैंप के जरिए पर्यावरणीय शिक्षा देनी है। अक्टूबर से जून तक प्रति महीने छह शिविर के हिसाब से हर वर्ष 500 स्टूडेंट्स को प्रशिक्षण देने का टारगेट है। शासकीय स्कूलों के लिए यातायात व भोजन व्यवस्था नि:शुल्क, मध्यम श्रेणी के स्कूलों के लिए यातायात के लिए 50 फीसदी रियायत और भोजन के लिए प्रति छात्र 150 रुपए का शुल्क निर्धारित किया गया है। आर्थिक रूप से संपन्न स्कूलों के बच्चों के लिए यातायात स्वयं, भोजन 3 दिनों का 450 रुपए और रखरखाव शुल्क 150 रुपए निर्धारित किया गया है।
केस-2
केस-1
बुका में 47 लाख खर्च, कैंप नहीं लगा
कटघोरा वन मंडल के अंतर्गत मड़ई से 5 किलोमीटर दूर बुका में 47 लाख की लागत से नेचर कैंप की स्थापना की गई है। रेंज अफसर आरएस राठिया ने स्टूडेंट के नेचर कैंप के टारगेट व उद्देश्य आदि के बारे में पहले तो अनभिज्ञता जताई, फिर जानकारी लेकर बताया कि स्थापना के बाद से अब तक वहां स्टूडेंट का 3 दिनी कैंप नहीं लग पाया है।
खोंद्रा में एक भी दिन कैंप नहीं लगा
बिलासपुर वन मंडल के अंतर्गत नेचर कैंप खोंद्रा बिलासपुर से कटघोरा पाली मार्ग पर बगदेवा से पूर्व दिशा की ओर है। यह बिलासपुर से 50 किलोमीटर दूर है। आरएफओ सुनील कुमार बच्चन के मुताबिक 32 लाख की लागत से जून 2014 में नेचर कैंप की स्थापना की गई। तब से अब तक योजना के मुताबिक वहां 3 दिनों का एक भी कैंप नहीं लग पाया।
कैंप नहीं लगने की जांच कराई जाएगी
स्कूली बच्चों को पर्यावरण की शिक्षा देने के लिए नेचर कैंप की योजना शुरू की गई है। योजना फेल्यूअर नहीं है। नेचर कैंप में यदि कैंप नहीं लगाए जा रहे हैं तो इसकी जांच कराई जाएगी। नेचर कैंपों की माॅनिटरिंग डीएफओ को करनी है।’’ -एए बोआज, पीसीसीएफ


मानिटरिंग के अभाव में दम तोड़ रही शासन की योजना