बिरगहनी... जहां पंचगव्य पर रिसर्च, बच्चों में हीमोग्लोबीन बढ़ाने की कवायद भी चल रही
कुपोषण दूर करने के लिए ये प्रयास
कृषि विभाग के अधिकारियों के प्रयास से तखतपुर ब्लॉक के बिरगहनी गांव की तस्वीर बदल रही है। यहां कृषि के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि बच्चों में पोषक तत्व लाने के अलावा ऐसे भी प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाया जा सके। एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के पौध रोग विशेषज्ञ यहां जैविक खेती को बढ़ावा देने की मंशा से पंचगव्य पर रिसर्च कर रहे हैं तो दूसरे अधिकारी लड्डू तैयार कर बच्चों में हीमोग्लोबीन की मात्रा बढ़ाने में जुटे हैं। यहां यह काम छह महीने से चल रहा है, जिसका सकारात्मक परिणाम नजर आ रहा है। ग्रामीण भी इनके प्रयासों की सराहना कर रहे हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के वैज्ञानिक फसलों को बीजजनित रोगों से बचाव में पंचगव्य कितना असरदार है, इस पर रिसर्च कर रहे हैं। छत्तीसगढ़, उत्तराखंड समेत अन्य राज्यों के किसान इसका इस्तेमाल अलग-अलग नामों से कर रहे हैं। यहां यह रिसर्च दो महीने से चल रहा है, जिसे एग्रीकल्चर कॉलेज परिसर और बिरगहनी गांव में किसानों के खेतों में किया जा रहा है। रिसर्च तीन चरणों में की जा रही है, जिसकी दो रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तीसरा परिणाम आने के बाद इसे एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी दिल्ली भेजकर किसानों को जानकारी देने और खेतों में इस्तेमाल करने की स्वीकृति मांगी जाएगी। कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा के अलावा दलहन-तिलहन की खेती की जाती है। बीजों में बीमारी के कारण किसान परेशान रहते हैं। कृषि विभाग इनकी दिक्कत दूर करने का प्रयास करता है। फिलहाल किसान फसलों को बीमारी से बचाने के लिए खेतों में पंचगव्य और दूसरी विधियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो कुछ किसान पंचगव्य का इस्तेमाल धान, गेहूं, चना, सोयाबीन के साथ दाल और सब्जियों में करते हैं। बिलासपुर जिले के अलावा मुंगेली, बस्तर, अंबिकापुर और सुदूर इलाकों के किसान बड़े पैमाने पर इसका उपयोग कर रहे हैं।
तखतपुर के बिरगहनी गांव की यह तस्वीर। यहां दिल्ली से अधिकारियों ने पंचगव्य पर रिसर्च और दूसरी बातों का जायजा लिया, जिसके बाद वे लौट गए।
इन बीमारियों के लिए माना गया है बेहतर
किसान खेतों में स्पेयर के जरिए इसका छिड़काव करते हैं। विशेषज्ञ एक एकड़ खेत के लिए 200 लीटर पंचगव्य को ठीक मानते हैं। बीजजनित रोगों के साथ झुलसा, तना अंगमारी, भूरा धब्बा, दलहनी की सड़न और दूसरी बीमारियों में इसका उपयोग होता है। गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर से पंचगव्य बनाया जाता है। इसका इस्तेमाल किसान बरसों से खेतों में कर रहे हैं। यहां कीट नियंत्रक व अमृतपानी जैसे कई उत्पाद गोमय व गोमूत्र से तैयार किए जाते हैं। किसान बताते हैं कि जैविक खेती से भूमि उपजाऊ हो जाती है जिससे उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। यह विधि बहुत सस्ती पड़ती है।
प्रदेश में बढ़ते कुपोषण को रोकने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के जरिए दो किस्म के लड्डू तैयार किए गए हैं, जिसे किशाेरियों और बच्चों को खिलाने पर सकारात्मक नतीजे मिले। पहली रिसर्च बिरगहनी गांव में हुई है, जहां तीन महीने तक लड्डू खाने वाले बच्चों का वजन आठ किलो बढ़ा तो किशोरियाें में 5 मिग्रा हीमोग्लोबीन की वृद्धि दर्ज की गई। घरेलू नुस्खे से तैयार लड्डू को अागामी दिनों में महिला एवं बाल विकास विभाग के जरिए आंगनबाड़ी केंद्रों में बांटे जाने पर विचार चल रहा है। केवीके ने इसकी तैयारी कर ली है, जिसका प्रोसेस जल्द शुरू होगा। इससे सकारात्मक नतीजे मिलने की उम्मीद है।
ऐसा करते हैं प्रयास
लड्डू बांटने के बाद मिली सफलता आगे और हालात बदलने की कोशिश
केवीके ने इंडियन कौंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) के निर्देश पर यह रिसर्च किया। टीम में वैज्ञानिक, होम साइंस की प्रोफेसर के अलावा पैथालॉजिस्ट शामिल थे, जिन्होंने बच्चों और किशोरियों के दो समूह तैयार किए। इनमें 14-14 बच्चे थे। पहले इनकी जांच कराई, फिर तीन महीने तक यह लड्डू खिलाया। यदि तीन साल का बच्चा है तो उसे आधा यानी (25 ग्राम) और पांच साल वाले को पूरा लड्डू (50 ग्राम) खिलाया गया। आनाकानी करने वालों के मां-पिता का सहारा लिया गया। कुछ दिनों बाद यह उनकी आदत में शुमार हो गया। 14 से 16 उम्र समूह की किशोरियों को भी रोजाना इसे खिलाया गया। रिसर्च टीम ने रोजाना गांव पहुंचकर इनकी मॉनिटरिंग की, तब जाकर उन्हें सफलता मिली। टीम की डाॅ. निवेदिता पाठक का कहना है कि सामान्य परिवार लड्डू घर में तैयार कर बच्चों और किशोरियों को खिला सकते हैं। फर्क महसूस होगा।
दूसरे फेज की तैयारी कर रहे, अच्छे नतीजे मिल रहे, सबकुछ बदल रहा
केवीके ने लड्डू तैयार करवाकर बच्चों और किशोरियों को खिलाए हैं। इसके अच्छे नतीजे मिले हैं। महज तीन महीने में बच्चों का वजन आठ किलो बढ़ा है, वहीं किशोरियों में 5 मिली ग्राम हीमोग्लोबीन बढ़ा है। इसके इस्तेमाल के लिए ग्रामीणों को मोटिवेट किया जा रहा है। इसके दूसरे चरण की तैयारी चल रही है। गांव पहुंचकर जल्द ही इसे अमल में लाया जाएगा।’’ -डॉ. निवेदिता पाठक प्रोफेसर, होम साइंस, केवीके
पंचगव्य की तीसरी रपट आनी है जिसके बाद किसानों को प्रेरित करेंगे
खेती के लिए पंचगव्य कितना उपयुक्त है। इसके लिए बिरगहनी गांव में रिसर्च कर रहे हैं। इसके दो चरणों का काम पूरा हो चुका है। तीसरे चरण की रिपोर्ट आने के बाद इसे एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट दिल्ली भेजा जाएगा। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद किसानों को इसकी उपयोगिता समझाएंगे। दोनों रिपोर्ट फसलों के लिए पॉजीटिव मिल रहे हैं। संभावना है तीसरी रिपोर्ट भी बेहतर होगी।’’ - विनोद निर्मलकर, पौध रोग विशेषज्ञ, कृषि विभाग
हर महीने जायजा लेने पहुंचते हैं अधिकारी, इनोवेशन करने के लिए देते हैं आइडिया, फिर होता है काम शुरू