71 ड्रग इंस्पेक्टरों की भर्ती कर दी, जांच आैर कार्रवाई का अधिकार 7 माह बाद नहीं दिया
ये हैं ड्रग इंस्पेक्टर के काम, जांच जरूरी
दवा की जांच का काम प्रभावित नहीं हो रहा
सरकार ने नसबंदी कांड के बाद राज्य में सप्लाई होने वाली निजी और सरकारी दवाइयों की जांच के लिए 71 ड्रग इंस्पेक्टरों की नियुक्ति तो कर दी, पर उन्हें जांच और कार्रवाई का अधिकार सात महीने बाद भी नहीं दिया गया है। इसके कारण कहां, कौन सी दवाएं भेजी जा रही हैं, इसकी जानकारी लेने वाला कोई नहीं है। ये हालात प्रदेशभर में हैं, जिसके कारण दवाओं का इस्तेमाल जरूरतमंदों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। इधर, ड्रग कंट्रोलर का कहना है कि उन्होंने इसकी फाइल लॉ डिपार्टमेंट को भेज दी है। उनकी स्वीकृति मिलने के बाद निरीक्षक मैदानी अमले का जायजा लेंगे और अव्यवस्था दुरुस्त होगी।
डीबी स्टार टीम ने पड़ताल में पाया कि प्रदेश में ड्रग इंस्पेक्टर की कमी के कारण जीवन रक्षक और दूसरी दवाओं की जांच प्रभावित हो रही है। कहीं ग्लूकोज, कहीं सीरप तो कहीं टेबलेट मानकों के अनुरूप नहीं मिल रहे, फिर भी लापरवाही जारी है। सबसे हैरानी की बात यह कि बिलासपुर में मेंटल हाॅस्पिटल, सिम्स और जिला अस्पताल में सीजीएमएससी से भेजी गई दवा निजी कंपनी की रिपोर्ट के अाधार पर बांटी जा रही है, जबकि ऐसा करना गलत है। अधिकारी अमले की कमी का बहाना कर इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। तखतपुर के पेेंडारी में सिप्रोसिन दवा खाने के बाद 13 महिलाओं की मौत सबसे बड़ी लापरवाही है, जिसके बाद सरकार ने ड्रग इंस्पेक्टर और मेडिसिन की जांच के लिए लैब स्वीकृत किए हैं। हैरानी की बात यह कि सरकार दवा निरीक्षकों की नियुक्ति के बाद उन्हें सात महीने से वेतन भुगतान कर रही है, लेकिन नियमों के पेंच के चलते उनसे काम नहीं ले पा रही है। दरअसल, इन्हें जांच और कार्रवाई का अधिकार देने का मामला दो महीना से लॉ डिपार्टमेंट में अटका हुआ है। उनकी स्वीकृति मिलने के बाद ही इंस्पेक्टर जांच कर सकेंगे। ड्रग कंट्रोलर पीवी राव की मानें तो इनके कारण प्रदेश में दवाओं की जांच का काम प्रभावित नहीं हो रहा है, लेकिन जांच का अधिकार मिलने के बाद डिपार्टमेंट की मेन स्ट्रीम मजबूत हो जाएगी। इससे विभाग को लाभ होगा। उन्होंने संभावना जताई कि दो से तीन दिनों में यह फाइल स्वीकृति के बाद उन तक पहुंच जाएगी।
बिलासपुर में ड्रग डिपार्टमेंट की तस्वीर। यहां एक दर्जन इंस्पेक्टर रोजाना आते हैं, पर अधिकार नहीं होने के कारण लौट जाते हैं।
दवा की जांच, मेडिकल स्टोर के लाइसेंस तैयार करने, मेडिकल स्टोर में बेची जा रही दवाओं की रुटिन जांच करने, इनके लाइसेंस चेक करने और ड्रग से जुड़ी एजेंसियों में निरीक्षण करने का काम सौंपा है। किसी क्लीनिक में निर्धारित रकम से अधिक दाम वसूलने पर इसकी शिकायत औषधि विभाग से की जा सकती है। इसके अलावा दवाओं के अवैध कारोबार समेत दूसरे कामों पर रोक लगाना भी इनकी जिम्मेदारी होती है। जांच में लापरवाही मिलने पर ऐसा करने वालों के खिलाफ जुर्माना लगाना और ड्रग कंट्रोलर को इसकी रिपोर्ट देना इनके प्रमुख कामों में शुमार है।
मेडिसिन की लोकल पर्चेसिंग पर भी उठते रहे हैं सवाल, जवाब कुछ नहीं
सीएमएचओ दफ्तर हो या स्वास्थ्य विभाग के दूसरे केंद्र। लोकल बजट से खरीदी जाने वाली दवाइयों की जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लैब और ड्रग इंस्पेक्टर की कमी इसकी सबसे बड़ी वजह है। इसके बावजूद यहां की व्यवस्था जस की तस है। इसकी आड़ में कारोबारी जनता को मापदंडों के अनुरूप दवाइयां भेज रहे हैं या नहीं, इसे लेकर भी उहापोह की स्थिति है। इन मामलों में सवाल करने पर अधिकारी जानकर भी अनजान बनते हैं, जिससे मरीजों को इसके इस्तेमाल के बाद दिक्कत झेलनी पड़ती है। इसके बाद अव्यवस्था है।
सेंदरी मेंटल हॉस्पिटल में दवा की जांच को लेकर बरती जा रही लापरवाही
सेेंदरी के मेंटल हॉस्पिटल में सीजीएमएसी की दवा मानसिक रोगियों को खिलाई जा रही है। इसकी जांच को लेकर कुछ दिन पहले वहां के अधीक्षक ने ड्रग डिपार्टमेंट को चिट्ठी लिखी थी। इसमें पूछा गया था कि क्या मरीजों को देने वाली दवाओं की लैब में दोबारा जांच कराने की जरूरत है। ड्रग इंस्पेक्टर ने जवाब दिया कि यह वे कैसे बता पाएंगे, यह तय करना तो वरिष्ठ अधिकारियों का काम है। जाहिर तौर पर दवाआें की जांच नहीं हो रही, जबकि रांची के मेंटल हॉस्पिटल में दवाओं की दोबारा जांच होती है। ऐसे में लापरवाही समझी जा सकती है।
पीवी राव, ड्रग कंट्रोलर, ड्रग डिपार्टमेंट, छत्तीसगढ़
क्या वजह है कि ड्रग इंस्पेक्टर की भर्ती के सात महीने बाद उन्हें जांच या कार्रवाई करने का अधिकार नहीं दिया गया?
उनकी फाइल लॉ डिपार्टमेंट में अटकी है। इसके बाद नोटिफिकेशन होगा, फिर उन्हें जांच और कार्रवाई पूरा अधिकार मिलेगा।
यह मामला कब तक सुलझ जाएगा, जिससे सरकारी आैर निजी संस्थानों में दवाओं की प्रॉपर जांच हो सके?
संभवत: दो से तीन दिनों में यह प्रॅाबलम सुलझ जाएगी। मेरी इस मामले में उनसे बात चल रही है।
इसके कारण प्रदेश में दवाओं की जांच अधर में हैं, मेडिकल स्टोर में जांच के नाम पर खानापूर्ति हो रही है, इसे कैसे सुधरवाएंगे?
यह काम पूरा होने के बाद किसी तरह की कोई अव्यवस्था नहीं होगी। मैदानी अमला तकरीबन हर बात की जांच करेगा।
सरकार ने नियुक्ति के बाद नोटिफिकेशन के लिए कोई नियम नहीं बनाया है, जिसके कारण ऐसा चल रहा है?
नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है। किसी को परेशानी नहीं होगी। इसका काम जल्द पूरा होगा।
सरकार ने अगस्त 2015 में की थी नियुक्ति, ड्रग कंट्रोलर ने अनुमति के लिए सरकार को भेजी है फाइल, दो, तीन दिनों में मिलने की बात
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