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  • मृत्युपूर्व बयान लेने वाले तहसीलदार, तोरवा व बिल्हा टीआई का भी होगा बयान

कौन झूठा, सिसोदिया या फिर दो क्लर्क सच्चाई जानने 17 को फिर होगी पूछताछ

5 वर्ष पहले
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बिलासपुर. बिल्हा के युकां नेता राजेंद्र तिवारी के आत्मदाह और सेवती निवासी जीवनलाल मनहर की मौत के मामले में एक बार फिर बिल्हा एसडीएम कार्यालय के क्लर्क टीएन देवांगन और संतोष यादव का बयान लिया जाएगा। उन्हें नोटिस जारी कर 17 फरवरी को आने कहा गया है। उसी तारीख को मृत्युपूर्व बयान लेने वाले तहसीलदार, तारबाहर थाने के टीआई और बिल्हा टीआई को भी अपना पक्ष रखने बुलाया गया है।

राजेंद्र के आत्मदाह व जीवन की जेल में मौत के मामले में पहले चरण की सुनवाई पूरी हो चुकी है। अतिरिक्त दंडाधिकारी कोर्ट में दोनों ही पक्षों के वकील गवाहों व आरोपियों से पूछताछ कर चुके हैं। चूंकि ज्यादातर मामलों में पूर्व एसडीएम अर्जुन सिंह सिसोदिया ने क्लर्कों की गलती बताते हुए उन्हें जिम्मेदार ठहराया है। इसलिए अब उन्हें दोबारा बयान दर्ज करने बुलाया जा रहा है।
क्लर्क देवांगन व यादव ने तत्कालीन एसडीएम के निर्देश पर काम करने और कई बातों को नहीं जानने की बात कही थी। वहीं सिसोदिया ने आर्डरशीट में प्रकरण क्रमांक दर्ज नहीं करने, समंस के बजाय सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी होने व एसडीएम कार्यालय में काजलिस्ट, कार्यविभाजन व अन्य दस्तावेज नहीं मिलने के लिए दोनों क्लर्क को जिम्मेदार ठहराया था।
जांच अधिकारी ने क्लर्कों को नोटिस भेजकर 17 फरवरी को कोर्ट में उपस्थित होने कहा है। राजेंद्र के वकील उनसे सिसोदिया द्वारा दिए गए जवाब के आधार पर प्रश्न पूछेंगे। उसी तारीख को राजेंद्र का मृत्युपूर्व बयान लेने वाले तहसीलदार पीसी कोरी के साथ ही तारबाहर व बिल्हा थाने के टीआई को बुलाया गया है।
तहसीलदार व तारबाहर टीआई को राजेंद्र के वकील पवन चतुर्वेदी तो बिल्हा टीआई को सिसोदिया के वकील विभाकर सिंह के निवेदन पर बुलाया गया है। पढ़िए, दोनों क्लर्क व सिसोदिया ने कैसे एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया।
जो साहब कहते थे, करता था: यादव (14 जनवरी 2016)
क्या 107,116 के प्रकरण में दोनों पक्षों से मुचलका भरवाकर छोड़ा जाता है?
-इस मामले में मैं कुछ नहीं जानता।
आप दांडिक प्रक्रिया देखते हैं, फिर कैसे नहीं पता?
-नहीं जानता, जो सिसोदिया साहब कहते थे ऑर्डरशीट में लिख देता था।
पक्षकार को सुनवाई के लिए कितने समय बुलाया जाता था?
-सुबह 11 बजे, लेकिन साहब जब आते थे, तब सुनवाई होती थी।
ऑर्डरशीट या नोटशीट कहां बैठकर लिखते है?
-अपने कमरे में, कमरा नंबर 7।
15 अक्टूबर को पेशी थी, लेकिन ऑर्डरशीट में इसका कोई उल्लेख नहीं है?
-सिसोदिया के कहने पर पेशी दी गई थी।
हर तीसरे दिन राजेंद्र को पेशी में क्यों बुलाया जाता था?
-इस बारे में मुझे नहीं पता। क्यों बुलाते थे, सिसोदिया ही बताएंगे।
कोई समंस तामील होने के बाद जमानती फिर गिरफ्तारी वारंट जारी होता है?
-मुझे प्रक्रिया के बारे में नहीं पता। जो साहब कहते थे, मैं करता था।
क्या पहले गिरफ्तारी वारंट जारी होता है, फिर जमानती और फिर समंस?
-नहीं पता, जो सिसोदिया कहते थे, करते थे। इससे ज्यादा नहीं पता।
पता नहीं, सिसोदिया क्यों जमानतदार मांगते थे: देवांगन (3 फरवरी 2016)
107-116 के मामले में तीन माह की लंबी पेशी क्यों दी गई?
-जैसा सिसोदिया कहते थे, मैं करता था।
दूसरे जिले व तहसील का मामला होने के बाद भी वहां क्यों सुनवाई होती थी?
-ऐसा भूलवश हुआ होगा।
जमानत के बदले साढ़े सात हजार फिर दस हजार रुपए जियाउद्दीन से घूस मांगी?
-मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता। मैंने कोई पैसा नहीं लिया।
जमानत के बाद तीन बार समंस भेजा गया और गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
-इस संबंध में मुझे जानकारी नहीं है।
इसलिए सस्पेंड हुए हो। ये सारे सवाल विभागीय जांच में शामिल करेंगे? (जांच अधिकारी नाराज होकर)
-सर गलती हो गई।
गलती एक बार होती है, बार-बार कैसे?
-मैं वहीं करता था, जो सिसोदिया कहते थे।
क्या 107, 116 के मामले में मुचलका (बांड) भरकर व्यक्ति को छोड़ा जा सकता है?
-हां, पर पता नहीं पीठासीन अधिकारी (यानी कि सिसोदिया) क्यों जमानतदार मांगते थे।
गलतियों के लिए क्लर्क जिम्मेदार: सिसोदिया (10 व 11 फरवरी 2016)
बिल्हा एसडीएम कार्यालय के निरीक्षण में पता चला कि देवांगन बाबू कार्यविभाजन व अन्य दस्तावेज लेकर चले गए हैं?
-देवांगन सीनियर क्लर्क थे। दस्तावेज से जुड़े कार्य उनके द्वारा किए जाते थे। ऑफिस में दस्तावेज नहीं मिले तो इसके लिए क्लर्क जिम्मेदार है।
एसडीएम कार्यालय में काज लिस्ट संधारित नहीं किया जाता था?
-नहीं, काजलिस्ट बनाई जाती थी। उसी आधार पर सुनवाई होती थी। काज लिस्ट नहीं मिला तो देवांगन, यादव व चक्रधारी जिम्मेदार है।
विजय मनहर व राजेंद्र के केस में आर्डरशीट और दायरा पंजी में प्रकरण शुरू होने की तारीख अलग-अलग कैसे हैं?
-दांडिक प्रकरण दायरा पंजी में दर्ज करने का काम क्लर्क यादव का है, उससे ही यह पूछा जाना चाहिए।
107, 116 व 151 के मामले में प्रकरण शुरू होने व दायरा पंजी में दर्ज होने की तारीख समान है। फिर विजय व राजेंद्र के मामले में देर क्यों हुआ?
-इसकी जानकारी क्लर्क यादव ही दे सकते हैं।
ऑपरेटर शंकर कौशिक ने हिर्री थाने के दांडिक मामलों की सुनवाई डायस में तो बिल्हा की सुनवाई कमरे में लेने की बात कही थी?
-मैं सारे प्रकरण डायस पर बैठकर ही सुनता था। ऑपरेटर का कहना गलत है।
दीपक राजपूत ने रिश्वत देने की बात कही है। इसमें क्या सच्चाई है?
-इसका जवाब तो देवांगन बाबू ही
दे सकते हैं कि उन्होंने पैसा लिया कि नहीं।
जब 15 अक्टूबर को राजेंद्र कोर्ट नहीं आया तो आदेश पत्रक में उसके हस्ताक्षर कैसे हैं?
-यह नहीं पता कि उसके हस्ताक्षर कैसे और किस आधार हुए, क्लर्क यादव बता सकता है। प्रकरण उसके पास था।
आपके कार्यालय में प्रिंटेड फार्म पर मुचलके की राशि दर्ज नहीं की जाती थी, सीधा गिरफ्तारी वारंट जारी करें, लिखा जाता था?
-यह लिपिकीय त्रुटि है। बाबू की गलती है।
क्या यह सही है कि आदेश पत्रिका/आर्डरशीट आप स्वयं लिखा करते थे?
-हां, ज्यादातर आर्डरशीट मैं स्वयं लिखता था। कभी-कभी बाबू लिखते थे और मैं पढ़कर हस्ताक्षर करता था।
फिर आपके बाबू ने आपके बिना जानकारी के दूसरे दिन राजेंद्र तिवारी का हस्ताक्षर करा लिया था?
-इसका जवाब क्लर्क यादव दे सकता है।
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