पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Bilaspur Krishi Adhikari Nahi Aate Round Per

फसलों पर कीट प्रकोप से परेशान किसान, दवा भी बेअसर,आराम फरमाते जिम्मेदार

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
बिलासपुर। मुंगेली, फसलों में लग रही बीमारी की रोकथाम के लिए किसान चिंचित हैं। वे बीमारी के लक्षण बताकर दुकान से दवा खरीद कर खेतों में छिड़क रहे हैं। लगातार बारिश व बदली से जहां धान की फसल को लाभ हो रहा है वही कीट प्रकोप, बीमारी से नुकसान भी हो रहा है। किसानों का आरोप है कि कृषि अधिकारी क्षेत्र का दौरा करने के बजाय घर बैठे आंकड़ा प्रस्तुत करते हैं।
किसान दवा का छिड़काव कर रहे हैं, पर बदली-बारिश के कारण कीटनाशक असर करने से पहले धुल जाते हैं। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। लगातार बारिश से अब धान के पौधों में रोग बढ़ने की संभावना बढ़ गई है। धूप नहीं निकलने से किसान फसलों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। धान के खेतों में फैली बीमारी के संबंध में उचित सलाह नहीं मिलने से किसान परेशान हैं। जिले में कुछ दिनों से हल्की बारिश व बदली से उमस का वातावरण है।
धान के पौधे का ऊपरी हिस्सा सूख रहा
बारिश व बदली से धान, सोयाबीन, अरहर, उड़द के खेतों में कीट प्रकोप नजर आ रहा है। पहले बारिश न होने से धान की खेती प्रभावित हुई। देर से बोनी होने से खेती का काम पिछड़ता गया। पहले किसान अकाल की आशंका से घबराए थे। सावन में हुई बारिश से किसानों को राहत मिली। निंदाई, गुड़ाई के बाद धान के बड़े होते लहलहाते पौधे देखकर किसान प्रफुल्लित हो रहे थे। अब धान के खेत में कीट प्रकोप ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। पिछले कुछ दिनों से लगातार बारिश होने व बादल छाए रहने से धान के पौधों को धूप नहीं मिल रही है। खेतों में पानी भरा होने से बीमारी, कीट प्रकोप की संभावना बढ़ गई है। धूप नहीं निकलने से धान के खेतों में तना छेदक, ब्लास्ट, ऊपरी हिस्सा सूखने की बीमारी शुरू हो गई है। तना छेदक में कीट धान के पौधों के बीच में उत्पन्न होकर पौधे के तने को निशाना बनाता है। उसे छेदकर पौधे को ही नष्ट कर देता है। पत्ती मोड़क कीट प्रकोप से पत्तियां सफेद धारीदार हो जाती हैं, कीट अन्य पत्तियों को चिपकाकर खोल बना कर रहता है तथा पत्ती के हरे भाग को खाकर नष्ट कर देता है। धान में शीत ब्लास्ट, झुलसा रोग तनाछेदक हो सकता है। किसान खाद दुकानों से दवा लेकर खेतों में छिड़काव कर रहे हैं। धान के पौधों में लगी बीमारी कंट्रोल नहीं होने से वे परेशान हैं। बारिश से उन्हें फायदा कम नुकसान ज्यादा होता दिखाई दे रहा है।
किसानों का कहना है कि कृषि अिधकारी क्षेत्र का दौरा नहीं करते
ग्राम चमारी के किसान रामजी साहू ने बताया धान के पौधे में ऊपरी हिस्सा सूखने की बीमारी हो रही है। खाद दुकानदारों से सलाह लेकर दो-तीन किस्म का कीटनाशक डालने के बाद भी बीमारी कंट्रोल में नहीं आ रही है। मौसम पूरी तरह खुल नहीं पा रहा है। धूप नहीं निकलने से भी फसल पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। पत्ता मोड़, ब्लास्ट, तनाछेदक से बचाने फसल में किसान दवा तो डाल रहे हैं पर बदली व हो रही बारिश के चलते दवा का असर नहीं हो रहा है।
मौसम खुलने का इंतजार करना पड़ेगा। तनाछेदक होने पर क्लोरो पाइसिफास एक एकड़ में 400 एमएल 10 स्प्रेयर के घोल से छिड़काव करें। जैविक कीटनाशक बवेरिया बासियाना एक किलो प्रति एकड़ या रासायनिक खाद में कांटाफ 8 किलो प्रति एकड़ या क्विनॉल फासे 300 मिली प्रति एकड़ में छिड़काव करें। पत्ती मोड़क होने पर फिप्रोनिल 800 मिली या क्लोरो पायरीफॉस 15 सौ मिली प्रति हेक्टेयर 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
- आरके डाहिरे, वरिष्ठ कृषि अधिकारी
एक बार दवा का छिड़काव कराने में 7 से 8 सौ रुपए खर्च आता है
ग्राम पुरान के किसान आलोक सिंह परिहार ने कहा तीन-चार दिनों से हो रही हल्की बारिश व लगातार बदली से धान के खेतों में बीमारियां आ रही हैं। एक एकड़ खेत में एक बार दवा छिड़काव करने में 7 से 8 सौ रु खर्च आता है। ग्राम चमारी, पुरान, संबलपुर, तरवरपुर, कारेसरा, हरिहरपुर के किसानों ने बताया धान के ऊपरी हिस्से सूखने की बीमारी हो रही है। फसल में बीमारी रहने से उत्पादन में भी गिरावट आती है। फसल में खरपतवार की भरमार हो गई है, इसमें सांवा, बदौरी जैसी खरपतवार ज्यादा है। तनाछेदक बीमारी ने भी फसल को प्रभावित किया है। तनाछेदक होने से उत्पादन कम होने की आशंका है। पत्ती मोड़क, ब्लॉस्ट, तनाछेदक से धान की फसल को नुकसान हो रहा है। किसानों का कहना है पहले धान के खेतों में कीटनाशक डालने की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन अब एक बार दवा डालने के बाद भी असर न होने से दुकानदारों ने पुनः दवा का छिड़काव करने को कह रहे हैं। बार-बार दवा का छिड़काव करने से आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ती हुई महंगाई में दवा के दाम भी आसमान पर हैं। ऐसे में निम्न, मध्यमवर्गीय किसान को दोबारा दवा का छिड़काव करने के पहले सोचना पड़ रहा है।