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सीएजी ने नगर निगम से पूछा, सीवरेज के 29 करोड़ रुपए का ब्याज कहां है?

7 वर्ष पहले
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बिलासपुर। केंद्र सरकार से अंडरग्राउंड सीवरेज प्रोजेक्ट के लिए बिलासपुर नगर निगम को मिले 29 करोड़ रुपयों का मद बदलने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। भारत के महालेखाकार (सीएजी) ने पूछा है कि मद की राशि वापस जमा करने के बाद इसके ब्याज का कोई हिसाब-किताब क्यों नहीं दिया गया? सीएजी की रिपोर्ट में इस पर आपत्ति जताई गई है। ब्याज की राशि करीब 50 लाख रुपए है।
निगम के तत्कालीन कार्यपालन अभियंता व प्रभारी कमिश्नर एमए हनीफी के निलंबन और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया था। नगर निगम में केंद्रीय योजनाअों की राशि के मद परिवर्तन का जिन्न एक बार फिर निकल आया है। राज्य शहरी विकास अभिकरण (सूडा) के सीईओ डाॅ. रोहित यादव ने नगर निगम प्रशासन को पत्र लिखकर तीन दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी है कि 29 करोड़ रुपए के ब्याज का क्या हुआ? सीईओ के निर्देश के बाद निगम कमिश्नर रानू साहू ने निगम के डिप्टी कमिश्नर हिमांशु तिवारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया है।
15 दिसंबर तक देनी है रिपोर्ट
नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर हिमांशु तिवारी ने जांच शुरू कर दी है। निर्देश के मुताबिक उन्हें 15 दिसंबर तक जांच रिपोर्ट देनी होगी। जानकारों का कहना है कि मद परिवर्तन के मामले में ब्याज की क्षति का अगर आकलन नहीं किया गया तो यह अमानत में खयानत का मामला बनेगा। इसकी जद में एक बार फिर तत्कालीन कमिश्नर हनीफी आएंगे।
मद परिवर्तन से हुआ 50 लाख से अधिक का नुकसान
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने राज्य शासन को पत्र लिखकर सीएजी की रिपोर्ट के हवाले से जेएनएनयूआरएम योजना के तहत सीवरेज प्रोजेक्ट के लिए मिले 29 करोड़ रुपए के मद परिवर्तन के दौरान ब्याज की राशि के बारे में जानकारी मांगी है। यह राशि निगम को वर्ष 2007-08 में मिली थी। तत्कालीन प्रभारी कमिश्नर हनीफी ने इसे अन्य कार्यों में खर्च कर दिया था। इसकी भरपाई वर्ष 2009 में तत्कालीन कमिश्नर मुकेश बंसल ने शासन से दूसरेे मदों और राजस्व की आय से की थी। सीएजी की आपत्ति इस बात को लेकर है कि मद परिवर्तन की राशि की भरपाई भले ही कर दी गई, लेकिन इस बीच इसके ब्याज का कोई हिसाब नहीं दिया गया। सूत्र बताते हैं, वर्ष 2007 से 2009 के बीच इसका ब्याज करीब 50 लाख रुपए होगा। नियमत: ब्याज भी मद की राशि के साथ जमा किया जाना था, जो नहीं किया गया।
सजा के तौर हनीफी की सैलरी दो स्टेज नीचे की गई थी

नगर निगम के कार्यपालन अभियंता और तत्कालीन प्रभारी कमिश्नर एमए हनीफी के खिलाफ एमआईसी से स्वीकृति के बिना निर्माण कार्य करवानेे, वित्तीय अनियमितता आदि को लेकर 9 विभिन्न बिंदुओं पर जांच की गई थी। इसमें एक को छोड़कर बाकी सभी आरोप सही मिले। 2012 में अवर सचिव एलडी चोपड़े ने आदेश जारी कर हनीफी को उस समय मिलने वाले वेतनमान को दो स्टेज नीचे करने की सजा दी। निगम में प्रभारी कमिश्नर के रूप में 28 दैवेभो का नियमितीकरण पद स्वीकृति के एक माह पहले कर देने से उनके वेतन-भत्तों के 1,95,730 रुपए का अतिरिक्त भुगतान नगरीय निकाय को करना पड़ा। इसकी वसूली हनीफी से करने के आदेश हुए।
एफआईआर की जांच अब तक नहीं हुई

नगर निगम में राशि का मद परिवर्तन करने के मामले में वर्ष 2009-10 में हनीफी के खिलाफ निगम प्रशासन ने सिविल लाइन पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई गई थी। पुलिस ने धारा 420, 409, 467, 468 एवं 471 के अतिरित 13(1)डी, 13(2) के तहत जुर्म दर्ज किया है। एक-दो अफसरों के बयान के बाद यह जांच दो सालों से ठंडे बस्ते में चली गई है। यह प्रकरण पुलिस की एसआईटी को सौंपा गया, लेकिन वहां भी खात्मे की कोशिशें शुरू कर दी गई थी।