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बिलासपुर निगम में मार्कशीट फर्जीवाड़ा, छह पर जुर्म दर्ज

7 वर्ष पहले
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बिलासपुर । फर्जी अंकसूची लगाकर नगर निगम में सहायक शिक्षक की नौकरी हासिल करने के मामले में पुलिस ने छह लोगों को आरोपी बनाया है। इनमें से एक को गिरफ्तार कर लिया गया है। स्क्रूटनी के दौरान इस फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ था। भर्ती के दौरान 27 उम्मीदवार ऐसे थे, जिनकी मार्कशीट फर्जी थी। तत्कालीन नगर निगम कमिश्नर के निर्देश पर पुलिस ने जांच के बाद यह कार्रवाई की।
वर्ष 2013 में प्रदेशभर के नगरीय निकायों में सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किए गए थे। इसके लिए सभी निकायों ने आवेदन मंगवाए। बिलासपुर नगर निगम में कुल 164 पदों के लिए 72 उम्मीदवारों का चयन हुआ था। दस्तावेजों की स्क्रूटनी के बाद जांच में पता चला कि चयनित उम्मीदवारों में से 27 की अंकसूची फर्जी थी। माध्यमिक शिक्षा मंडल से भी इसकी पुष्टि करवाई गई। फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद नगर निगम कमिश्नर ने यह मामला पुलिस को सौंप दिया। पुलिस ने जांच की तो फर्जीवाड़ा करने वालों में सरकंडा विजयापुरम् निवासी 46 वर्षीय घनश्याम यादव का नाम सामने आया। इसी शख्स ने साथियों की मदद से उम्मीदवारों की मार्कशीट के नंबरों में हेरा-फेरी की थी।
काउंसिलिंग के बाद लेन-देन होना था। पुलिस ने जांच के बाद घनश्याम यादव के अलावा लवकुश शुक्ला, मोहन उर्फ जितेंद्र भारद्वाज, रामचंद्र ध्रुव, रविंद्र यादव, उपेंद्र को आरोपी बनाया है। सभी के खिलाफ धारा 420, 467, 468, 471, 34 के तहत जुर्म दर्ज किया गया है। इस मामले के बाकी आरोपी भिलाई दुर्ग व अन्य शहरों के रहने वाले हैं। आगे इन सभी पर कार्रवाई की जाएगी।
मुख्य आरोपी निलंबित शिक्षक, प्रदेशभर में है रैकेट
मुख्य आरोपी घनश्याम यादव निलंबित शिक्षक है। वह गौरेला क्षेत्र के ग्राम वेलपत में पदस्थ था। मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी के कारण उसे सस्पेंड किया गया था। वह काठाकोनी में हाईस्कूल संचालित करता है। बताया जाता है कि वह प्रदेश स्तर पर फर्जी मार्कशीट का रैकेट चलाता है। पहले भी ऐसे ही एक अन्य मामले में उसके खिलाफ जुर्म दर्ज किया जा चुका है।
मैरिटवालों की मार्कशीट की स्कैनिंग
पुलिस जांच में पता चला है कि जिन उम्मीदवारों की अंकसूची में गड़बड़ी मिली है, उन्हें आरोपियों ने खुद संपर्क कर नौकरी दिलवाने का झांसा दिया था। उनसे कहा गया था कि नौकरी से मतलब रखो और पैसे की व्यवस्था करो। उम्मीदवारों को मार्कशीट में फर्जीवाड़े की जानकारी नहीं थी। नौकरी मिलने के बाद पैसे का लेन-देन होना था। गिरोह के सदस्यों के पास मैरिटोरियस स्टूडेंट्स की अंकसूची थी। वे उन्हें स्कैन करवा लेते थे। इसके बाद नाम व रोल नंबर बदलकर उसी मार्कशीट को आवेदन के साथ जमा कर देते थे।
आईजी ने सीएसपी को दिए थे आदेश
आईजी पवन देव ने इस मामले में जल्द कार्रवाई के लिए सीएसपी को आदेश दिए थे। सिविल लाइन सीएसपी लखन पटेल के अनुसार चयनित सभी 27 उम्मीदवारों के बयान लेना जरूरी था। सभी अलग-अलग शहरों के रहने वाले हैं। दोषियों की समीक्षा जरूरी थी। बताया जाता है कि इनमें से अधिकांश ने अपने हाथ से फार्म नहीं भरे थे।