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सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लाखों रुपए की दवाइयां कूड़े में

7 वर्ष पहले
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बिलासपुर. ये तस्वीरें किसी कचरे के ढेर की नहीं, बल्कि उन दवाइयों की है जो सरकार ने गरीब मरीजों के लिए भेजी हैं। मरवाही के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लाखों रुपए की दवाइयां यूं ही फेंक दी गई हैं और इधर मरीजों को दवा दुकानों का रास्ता दिखा जाता है। फेंकी गईं इन दवाइयों की एक्सपायरी नहीं हुई है।

इनमें आयरन सिरप, टेबलेट, कफ सिरप, ओआरएस, सहित कई जरूरी दवाइयां शामिल हैं, जिनसे हजारों मरीजों का इलाज हो सकता है। जिले के तकरीबन सभी प्राथमिक सामुदायिक व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में हर साल इसी तरह लाखों रुपए की दवाइयां फेंक दी जाती हैं। राज्य शासन सरकारी अस्पतालों के लिए हर साल करोड़ों रुपए की दवाइयां उपलब्ध कराता है। ये दवाइयां जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त में देनी है, लेकिन हकीकत ये है कि मरीज दवा के लिए भटकते रहते हैं। उन्हें बाहर की दवाइयां लिखी जाती हैं।

दूसरी ओर सरकारी तौर पर सप्लाई में मिली दवाइयों को कचरे में फेंक दिया जाता है। जिले के हर सामुदायिक-प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व उपकेंद्रों का यही हाल है। लगातार शिकायतों पर 'दैनिक भास्कर की टीम ने कुछ स्वास्थ्य केंद्रों की पड़ताल की। इस दौरान यह हकीकत खुलकर सामने आई। भास्कर की पड़ताल में पेंड्रा, गौरेला, मस्तूरी, तखतपुर, सीपत सहित कुछ अन्य केंद्रों में भी इस तरह की गड़बड़ी सामने आई। कचरे की तरह फेंकी गईं दवाइयों में कई की पैकिंग तक नहीं खुली है। थोक में ये उसी तरह पॉलिथीन में पैक है, जैसी सप्लाई के दौरान थीं।

अधिकांश सरकारी अस्पतालों में मेडिकल स्टोर और डॉक्टरों की सांठगांठ चल रही है। मरीजों को बाहर की दवा लिखी जा रही है। गौरेला के सेनेटोरियम में बाकायदा परिसर के अंदर ही निजी दवा दुकान खुल गई है। इससे शासकीय तौर पर सप्लाई में मिली दवाइयां मरीजों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। स्टोर में जगह की कमी की वजह से इन्हें बाद में इसी तरह कचरे में फेंक दिया जा रहा है।