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समस्याएं सुलझाने मुहिम छेड़कर भूल जाता है निगम, ऐसे में फिर लौट आता है पुराना ढर्रा

6 वर्ष पहले
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बिलासपुर। अवैध पार्किंग, पॉलिथीन जब्ती, अतिक्रमण के खिलाफ मुहिम हो या सड़कों से अावारा मवेशियों काे पकड़ने का मामला... नगर निगम की कोई भी मुहिम या कार्रवाई मंजिल तक पहुंचे बिना ही बंद हो जाती है। नियमित कार्रवाई न होने से लोग फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। निगम जनता की समस्याओं को सुलझाने मुहिम तो चलाता है, लेकिन मॉनिटरिंग के अभाव में कुछ ही दिनों में बंद कर देता है।
हद तो यह है कि आय बढ़ाने के लिए संपत्ति कर, जल कर जैसे शिविर तक नियमित रूप से नहीं लगाए जा रहे। स्थिति यह है कि शहर समस्याओं का गढ़ बन गया है और निगम घाटे की दुकान। वेतन बांटने और बिजली बिल जमा करने के लिए कई बार सरकार के आगे हाथ फैलाने पड़ते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि स्वायत्त निगम के मुखिया महापौर और आला अफसर कैसे शहर का भला कर पाएंगे?

आवारा मवेशियों को पकड़ने ड्यूटी लगाई थी : आवारा मवेशियों को पकड़वाने के लिए हफ्ते के सातों दिन सुबह और रात में दो पालियों में कुल 14 इंजीनियरों की ड्यूटी लगाई
गई थी। इन इंजीनियरों को अतिक्रमण निवारण दस्ते के प्रभारी प्रमिल शर्मा को मदद करनी थी।
निगम के अनियमित अभियान... गेप इतना लंबा कि बदइंतजामी फिर पसर जाती है
पार्किंग पर बिजनेस, सड़क पर खड़ी हो रहीं गाड़ियां
नगर निगम सात महीने में तीसरी बार अवैध पार्किंग को लेकर सख्त हुआ। मंगलवार को भारी-भरकम अमला कार्रवाई करने निकला। जुलाई 2014 में ऐसे भवनों पर ताबड़तोड़ कार्रवाइयां की गईं, जहां पार्किंग स्पेस पर बिजनेस चल रहा था। कुछ भवन सील किए, फिर कुछ दिन बाद डी-सील भी कर दिए। नवंबर 2014 में अमले की नींद फिर टूटी। चंद संस्थानों पर सीलिंग की गई। दरअसल, निगम अफसर भवन, कॉम्प्लेक्स मालिकों के खिलाफ नियमों का डंडा चलाने से बचते हैं। यही वजह है कि वे ढर्रे पर लौट आते हैं।
समाधान: डी-सीलिंग से पहले पार्किंग बनवाएं
पार्किंग नियमों का पालन न करने वाले भवन संचालकों के खिलाफ सख्ती बरती जाए। भवनों की सील तब तक न खोली जाए, जब तक पार्किंग की जगह तय न हो। हर भवन या कॉम्प्लेक्स के सामने सिक्याेरिटी गार्ड हो, जो वाहनों को निर्धारित स्थान पर पार्क करवाए। नगर निगम का एक अमला शहर में नियमित रूप से घूमकर पार्किंग इंतजामों की मॉनिटरिंग करे। पार्किंग स्पेस न मिलने पर सख्त कार्रवाई करे।
पॉलिथीन जब्त करने की कार्रवाई फिर थम गई
1 जनवरी 2015 को शासन ने पॉलिथीन पर बैन लगाया तो निगम और प्रशासन का जंबो अमला दुकानों, संस्थानों की जांच करने निकल पड़ा। दो-तीन दिनों के अंतराल में कार्रवाई कुछ दिन जैसे-तैसे चली, कुल-जमा 32 क्विंटल पॉलिथीन जब्त करने के बाद अमला फिर शांत पड़ गया। नतीजा, दुकानों में फिर से पॉलिथीन का जमा स्टॉक दोबारा चलन में आ गया है। चोरी-छिपे इसका प्रोडक्शन भी जारी है। पॉलिथीन के उत्पादन, बिक्री या इस्तेमाल पर निगम ने अब तक किसी के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की है।
समाधान: नो पॉलिथीन जोन तय कर मुहिम छेड़ें
नगर निगम प्रशासन शहर के किसी एक प्रमुख बाजार को नो पॉलिथीन जोन घोषित कर यहां से सख्त मुहिम की शुरुआत करे। कारोबारियों पर सख्ती बरती जाए, ताकि वे पॉलिथीन का इस्तेमाल न करें। लोगों में जागरूकता लाने के प्रयास किए जाएं। पॉलिथीन के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लगने तक मुहिम व कार्रवाई के लिए निगम व राजस्व से अलग संयुक्त सेल बनाकर प्रभारी की नियुक्ति की जाए।
मुहिम बंद, आवारा मवेशी फिर सड़क पर घूम रहे
नगर निगम प्रशासन ने 20 जनवरी को तय किया था, आवारा मवेशी पकड़ने वाली टीम के साथ इंजीनियर भी जाएंगे, लेकिन कई तो दफ्तर से ही नहीं निकले। 21 व 22 जनवरी को तय कार्यक्रम के मुताबिक क्रमश: गोपाल ठाकुर, फरीद कुरैशी, कुमार लहरे व एसके मानिक ने ड्यूटी दी। इस बीच कुल सिर्फ 26 आवारा मवेशी पकड़े गए। 23 जनवरी के बाद इंजीनियर अपने-अपने जोन में जुट गए। इसके बाद आवारा मवेशियों को पकड़ने की मुहिम दम तोड़ गई। सड़कों पर मवेशी फिर से नजर आने लगे।
समाधान: डेयरी व्यवसाय सख्ती से शिफ्ट किया जाए
ट्रैफिक में बाधक बने ज्यादातर मवेशी आवारा नहीं हैं। इन्हें डेयरी संचालकों ने शहर में ही पाल रखा है। घुरू गांव में करोड़ों रुपए की लागत से बसाए गए गोकुल नगर में शहर के डेयरी व्यवसाय को पूरी तरह शिफ्ट करवाया जाए। ऐसा करने के बाद आवारा मवेशियों की समस्या खुद ब खुद हल हो जाएगी।
सीधी बात
अमला कम, काम अधिक... नियमित नहीं चल सकती मुहिम
निगम की मुहिम या शिविर सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं। सचमुच इनका फायदा मिले, इसके प्रयास किए जाते हैं?

{अतिक्रमण निवारण दस्ता सौंपे जाने वाले काम को बेहतर ढंग से अंजाम देता रहा है। अवैध पार्किंग, अतिक्रमण, सड़क पर डंप बिल्डिंग मटेरियल की जब्ती, बीच सड़क पर लगने वाले ठेले-दुकानों पर कार्रवाई इसमें शामिल है। लोगों को इसका तात्कालिक लाभ भी मिलता है। स्थाई समाधान के लिए नियमित मुहिम जरूरी है।
कोई भी मुहिम महज दो-चार दिनों में ही ठप क्यों और कैसे हो जाती है?

{ अतिक्रमण उन्मूलन दस्ते के पास दो काऊकैचर और 30 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं। नियमित स्टाफ सिर्फ दो हैं। वाहन व कर्मचारी सीमित होने से एक ही दिन में कई अभियान एक साथ नहीं चल सकते। शासन के निर्देश के मुताबिक अलग मुहिम चलाई जाती है, जैसे पॉलिथीन जब्ती का अभियान आदि। नियमित मुहिम के लिए वाहन के साथ स्टाफ की जरूरत है।