बिलासपुर. शासन अब ऐसी किसी भी सोसायटी का बोझ नहीं ढोना चाहता, जिसका कोई औचित्य ही नहीं है। न इससे जनता को फायदा हो रहा है और न ही शासन को, ये खुद भी घाटे में हैं। ऐसे में इन सोसायटियों को बंद करने के लिए इनके खिलाफ परिसमापन की घोषणा ही नहीं की गई है। इसके लिए परिसमापक भी तय कर दिए गए हैं।
उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं उमेश तिवारी के धमतरी तबादले के बाद जिले में नए रजिस्ट्रार डीआर सिंह आए हैं। उनके आने के बाद ही ऐसी 152 सोसायटियां की सूची तैयार की गई है, जो केवल नाम की रह गई है। दरअसल, जिस उद्देश्य से इन सोसायटियों की स्थापना की गई थी, वह पूरा नहीं हुआ। सोसायटी अघोषित तौर पर सालों से बंद हैं। ऐसे में उनके होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।
हां, इतना जरूर हो रहा है कि अधिकारी-कर्मचारियों को इन सोसायटियों की कागजी औपचारिकताएं जरूर पूरी करनी पड़ती हैं। इसमें समय व धन दोनों की बर्बादी हो रही है। इनमें दूध उत्पादन, खनिज, कृषक कल्याण, मछुआरों के अलावा पशुपालन और ऑटो
मोबाइल की समितियां शामिल हैं। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ सहकारी संस्थाएं, नियम 1962 के उपनियम 57 (5) के तहत इन सोसायटियों को परिसमापन में डालते हुए सहकारिता निरीक्षकों को परिसमापक नियुक्त किया गया है।
संपत्ति या रिकॉर्ड नहीं सौंपा तो होगी कार्रवाई
सोसायटियों के परिसमापन से पहले इनके दावेदार या लेनदारों को 60 दिनों के भीतर दावा प्रस्तुत करने के लिए कहा है। इसके बाद आपत्तियों पर विचार नहीं किया जाएगा। इन संस्थाओं से जुड़े लोगों को संपत्ति और रिकाॅर्ड तत्काल परिसमापक को सौंपने के निर्देश दिए हैं और अगर इसके बाद भी ऐसा नहीं किया जाता है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही जा रही है।
डिप्टी रजिस्ट्रार ने जताई अनभिज्ञता
इधर, इस पूरे मामले से नए डिप्टी रजिस्ट्रार डीआर ठाकुर ने अनभिज्ञता जताई है। दैनिक भास्कर ने जब उनसे इस संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा कि इस संबंध में कोई जानकारी नहीं। वे फाइल देखकर ही कुछ बता सकेंगे। 152 सहकारी समितियों के परिसमापन को लेकर नए डिप्टी रजिस्ट्रार की यह अनभिज्ञता संदेह के दायरे में है। जानकारों के मुताबिक परिसमापन का आदेश उन्होंने खुद दिया है, लेकिन अब वे इस मामले से कन्नी काट रहे हैं।