बिलासपुर। जनप्रतिनिधि एनआईटी, आईआईटी और सेंट्रल यूनिवर्सिटी खुलवा तो लेते हैं लेकिन इनमें क्वाॅलिटी एजुकेशन दिलाने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। इसके बाद इन संस्थानों की ऑटोनॉमी यानी स्वायत्ता का मसला है। शुरू होने के कुछ सालाें बाद ही अधिकतर की आर्थिक स्थिति खराब होने लगती है, इसका स्थायी हल भी जरूरी है। एक और अहम मसला है, हमारे देसी संस्थान पैमानों के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहां और कितने टिक पाते हैं। ऐसे तमाम ज्वलंत मुद्दे हैं, जिन पर बिलासपुर यूनिवर्सिटी में होने वाले कुलपति सम्मेलन में चर्चा होगी।
शहर के टॉप स्कूलों के प्रतिभावान बच्चे आज भी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं लेते। अभिभावक उन्हें पुणे, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे महानगर में हायर एजुकेशन के लिए भेजते हैं। यही हाल टेक्नीकल और मेडिकल एजुकेशन के संस्थानों का है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में एनआईटी, गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी और एम्स खोले जा चुके हैं, लेकिन खुलने के बाद से अब तक वह क्वाॅलिटी आ सकी, जिसकी उम्मीद है। इनकी मॉनिटरिंग करने वाले संस्थान इनोवेशन की बात करते हैं, लेकिन पुराने ढांचे को मजबूत करने की गंभीरता नहीं दिखाते।
जहां ऑटोनाॅमी, वहीं क्वाॅलिटी एजुकेशन
बिलासपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. जीडी शर्मा कहते हैं, जहां यूनिवर्सिटी की ऑटोनॉमी होगी, वहीं क्वाॅलिटी एजुकेशन होगा। इसका सीधा संबद्ध ऑटोनॉमी से है। इसके होने से फंडिंग भी जरूरत के मुताबिक और नियम से होगी। एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज की वीसी कांफ्रेस के को-आॅर्डिनेटर डॉ. अमरेंद्र पाणी के अनुसार क्वाॅलिटी एजुकेशन के लिए ऐसे इलाकों में संस्थाएं खुलें तो उन्हें वह लेवल पाने समय दिया जाए।
शिक्षा का स्तर लगातार गिरने की वजहें
1. उच्च शिक्षा में रिवाइज्ड बेस्ड क्रेडिट सिस्टम, स्किल डेवलपमेंट, कॉलेजों में सेमेस्टर कोर्स आदि व्यवस्थाएं लागू हो रही हैं, लेकिन इसके लिए न्यूनतम सुविधाएं कॉलेजों में नहीं हैं।
2. विभागों में न्यूनतम फैकल्टी नहीं है। वे सुविधाविहीन इलाकों में जाना भी नहीं चाहते।
3. पर्याप्त फंडिग नहीं हो रही है, जिसके कारण रिसर्च तेज गति से नहीं हो पा रही है।
4. इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान नहीं दिया जाता है। आने-जाने की सुविधा भी नहीं।
5. संस्था के विभिन्न विभागों में दी जाने वाली सुविधाओं में असमानता।
6. अफसर, प्राध्यापक हों या कर्मचारी, तकरीबन सभी संस्थानों में सेटअप के मुकाबले अमला आधा है।
संस्थाएं खोलें, लेकिन स्तर मेंटेन करें
पैरेंट्स जानते हैं एजुकेशन का लेवल, इसलिए बाहर भेज रहे बच्चों को पहले और अब की शिक्षा में फर्क है। पैरेंट्स एजुकेशन अब अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते हैं। इसके लिए उन्हें पढ़ने दिल्ली और मुंबई क्यों न भेजना पड़े। उन्हें यही क्वाॅलिटी यहां के संस्थानों में मिलती तो फिर बाहर पढ़ने को क्यों भेजते। हर बच्चा मेधावी नहीं होता, लेकिन उन्हें मेधावी बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है। यही वजह है कि क्वॉलिटी एजुकेशन नहीं आ पा रही है।
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डॉ. पीके दास, प्रोफेसर इन हेड, एंथ्रोपॉलॉजी, गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी