(फोटो- टाउन हाॅल)
बिलासपुर. शहर का इतिहास बिखरा पड़ा है। सदी पुराने भवन जर्जर हालात में पहुंच गए हैं। एक टाउन हॉल ही क्यों, राघवेंद्र राव सभा भवन, लेडीज गार्डन, बाल मंदिर, गोल बाजार, जयस्तंभ, पुत्रीशाला जैसी धरोहरों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। इन धरोहरों में स्थापत्य कला के नायाब नमूने और उस कालखंड की तस्वीर हैं। लेकिन न तो नगर निगम या जिला प्रशासन और न ही पुरातत्व विभाग को इनकी कद्र है।
एक जमाने में टाउन हाॅल शहर की सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था, तो राघवेंद्र भवन राजनीतिक गतिविधियों का। ये सारे भवन अपनी हालत पर आंसू बहा रहे हैं। नगर निगम की इच्छाशक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि करीब चार साल पहले टाउन हॉल को हैरिटेज बिल्डिंग बनाने के लिए फाइल चली, लेकिन यह टेबलों से नहीं उबर सकी।
सवाल यह नहीं कि इन धरोहर भवनों को अंग्रेजों ने बनवाया था या फिर आजादी के दौर के मालगुजारों ने। सवाल यह है कि हम इन्हें बिना सहेजे कैसे नौनिहालों को बताएंगे कि हमारा इतिहास क्या था? जयपुर, औरंगाबाद, दिल्ली, अमृतसर, चंडीगढ़ समेत देश-दुनिया में कई शहर ऐसे हैं, जो इतिहास और ऐतिहासिक भवनों को सहेज-संवारकर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं। शहर में भी दशकों पुराने भवनों को संवारने के लिए इस तरह की शुरुआत की जरूरत है। वह समय रहते, ताकि इन भवनों का अस्तित्व खत्म होने से बचाया जा सके।
जीवन के 70 बसंत देख चुके बुजुर्ग और इतिहासविद् अपनी यादों के झरोखे से बताते हैं कि उस दौर में इन भवनों का वैभव अलग ही था। इन इमारतों को बचाकर, संवारकर रखने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ी शहर के ऐतिहासिक पहलू से रूबरू हो सके।
ये हैं शहर की विरासत
1902 में बना टी. देहनकर कन्या पुत्री शाला भवन तिलक नगर
1923-31 में बना नार्मल स्कूल
1947 में बना राघवेंद्र राव सभा भवन
1937 में बना लेडीज गार्डन, बृहस्पति बाजार के पीछे
1933 में बना जयस्तंभ, शनिचरी बाजार
1937 में बना गोल बाजार
1930 के दशक में बना तोरवा पॉवर हाउस
टाउन हाॅल: आजादी की लड़ाई का गवाह
टाउन हाॅल की इमारत म्युनिस्पैलिटी के जमाने में शहर के उन चंद भवनों में शुमार है, जो पाश्चात्य और भारतीय शैली की मिली-जुली देन हैं। टाउन हाॅल जितना आकर्षक है, उससे कहीं ज्यादा इसका इतिहास उजला है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेज सरकार के डिप्टी कमिश्नर मिस्टर रेगे को पता चला, कांग्रेसी यहां झंडा फहराने वाले हैं तो नेहरू चौक पर घेरेबंदी कर उन्हें रोक लिया गया।
कांग्रेस नेता शिवदुलारे मिश्रा, पं. हरनारायण वाजपेयी आदि ने टाउन हाॅल के पीछे के रास्ते से छत पर चढ़कर तिरंगा फहराया। नेहरू चौक पर पुलिस की घेरेबंदी को तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे कांग्रेसियों की तब खुशी का ठिकाना न रहा, जब टाउन हाॅल में झंडा शान से लहराता नजर आया।
पॉवर हाउस: इसी से शहर ने जाना था, क्या होती है बिजली
तोरवा के पुराना पाॅवर हाउस में पहली बार पंजाब इलेक्ट्रिकल कंपनी ने भाप से बिजली बनाकर बेची। बॉयलर के लिए कोयले का इस्तेमाल किया गया। इसी कंपनी से सप्लाई की जाने वाली बिजली से शहर के ज्यादातर इलाके रौशन होते थे। साहित्यकार डाॅ. पालेश्वर शर्मा के मुताबिक 1936 में जब वे चौथी पढ़ते थे, तब पूरे शहर को इसी पाॅवर हाउस से बिजली सप्लाई होती थी।
म्युनिस्पैलिटी वाले चौराहों पर मिट्टी तेल का लैंप लगाते थे। पंजाब इलेक्ट्रिकल के आने के बाद स्ट्रीट लाइट लगाई गई। बिजली विभाग को शहर ही नहीं, बल्कि इसे अपने विभाग की धरोहर मानकर संभालना चाहिए। पुरानी चिमनी को सुरक्षित रखकर उसके पास गार्डन विकसित किया जा सकता है। इधर, पाॅवर हाउस भी खतरे में है। बिजली विभाग इसे ढहाने की तैयारी में है। इसके साथ ही 100 बरस पुरानी, 40 मीटर ऊंची चिमनी भी ध्वस्त हो जाएगी, जो शहर का लैंडमार्क है।
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