बिलासपुर. सहमति से तलाक की डिक्री मंजूर होने के बावजूद पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार होता है। जस्टिस संजय के. अग्रवाल की बेंच ने कहा है कि हिंदू
विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(ख) के तहत सहमति से विवाह विच्छेद होना भरण-पोषण देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता। हाईकोर्ट ने भरण-पोषण की राशि को बढ़ा दिया है।
दुर्ग में रहने वाली किरण गौतम की शादी ऋषिकेश सिंह से हुई। शादी के कुछ दिनों बाद पति और उसके परिवार वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने की वजह से वह पति से अलग अपने परिजनों के साथ रहने लगी। 25 मई 2002 को दुर्ग कोर्ट ने विवाह विच्छेद की डिक्री मंजूर कर ली। इसके बाद उसने पति से भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत किया। कोर्ट ने 3 मई 2008 को 2000 रुपए हर माह भरण-पोषण के तौर पर देने का आदेश दिया।
इसके खिलाफ दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन दाखिल की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय के. अग्रवाल की सिंगल बेंच में हुई। हाईकोर्ट ने पति के वेतन के आधार पर 1 जनवरी 2011 से भरण-पोषण की राशि को बढ़ाकर 3000 रुपए हर माह करते हुए एरियर्स की राशि देने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोहताश सिंह विरुद्ध रामेंद्री अन्य के मामले में दिए गए फैसले का हवाला आदेश में दिया गया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125(1) की व्याख्या करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पारित डिक्री के आधार पर तलाकशुदा महिला भरण-पोषण पाने के लिए प|ी की हैसियत का सीमित उपयोग कर सकती है।