बिलासपुर. जम्मू-कश्मीर में पिछले पखवाड़े भीषण बारिश के चलते बाढ़ और भूस्खलन की आपदा से पूरा देश चिंतित था। ऐसे हालात में 5 सितंबर को कटरा से वैष्णोदेवी की यात्रा के लिए रवाना हुए जूनी लाइन के ताम्रकार परिवार का प्रकृति की विनाश लीला से सीधा साक्षात्कार हुआ। मुसीबतों से भरे सफर में इस परिवार ने देखा कि बस आगे बढ़ती जा रही थी और किसी हॉलीवुड फिल्म की ट्रेजडी की तरह पीछे का रास्ता भूस्खलन से बर्बाद होता जा रहा था।
जूनी लाइन के श्याम ताम्रकार और जबड़ापारा के उनके चाचा गोकुल प्रसाद कसेर के परिवार को मिलाकर शहर के कुल सात लोग वैष्णो देवी के दर्शन के लिए निकले थे। श्याम ताम्रकार ने बताया कि 4 सितंबर को अमृतसर के गोल्डन टेंपल के सामने घुटनों तक पानी भर गया था। भीषण बारिश के दौरान उन्हें खटका कि अब आगे की यात्रा कठिन हो सकती थी और हुआ भी यही। जैसे-जैसे उनका कारवां पहाड़ी रास्ते पर बढ़ता गया, पीछे का रास्ता भूस्खलन में जमींदोज होता जा रहा था। अगले स्टाॅपेज पर पहुंचते ही पीछे का रास्ता बंद हो चुका था। उनके सामने एक ही चारा था, पीछे लौटने का ख्याल छोड़कर आगे बढ़ते रहना।
देवदूत बनकर आए जवान
श्याम ताम्रकार ने बताया कि जिस रास्ते से वे आगे बढ़े, उसमें
जम्मू और कटरा के बीच का पुल भी शामिल था, जो बारिश में बह गया। ऐसे कठिन समय में सेना के जवानों ने लगातार मेहनत कर पहाड़ी रास्तों को आवागमन के लायक बनाया। वैकल्पिक पुल तैयार किया। भारतीय सेना के साहस और मनोबल का परिचय साक्षात देखने को मिला, जब उन्होंने बाढ़ और भूस्खलन की विभीषिका के बीच राहत व बचाव के जोखिमपूर्ण कार्यों को बखूबी अंजाम दिया।
आपदा आते ही होटल और खाने-पीने के रेट दोगुने हुए
चार दिनों तक उन्हें कटरा के होटल में रुकना पड़ा। मुश्किल दौर आते ही होटल का रोज का किराया 500 से 1000 रुपए और खाने-पीने की चीजों के रेट दोगुने हो गए। चार दिन इंतजार के बाद मालूम हुआ कि एक रास्ता मंदिर जाने के लिए खोला गया है, जो 22 किमी के फासले पर है। सुबह 9 बजे निकला श्रद्धालुओं का कारवां रात 11 बजे वैष्णोदेवी के दरबार में पहुंचा। वापसी के लिए सुबह 4 बजे से पहाड़ी रास्ते से पदयात्रा शुरू हुई तो अगले दिन शाम को 4 बजे वे कटरा पहुंचे।