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कभी स्टिक खरीदने नहीं थे पैसे, अब देश के लिए खेलेंगी रेणुका
भारतीयमहिला हॉकी टीम में छत्तीसगढ़ की एक और बेटी शामिल हो गई है। इस बार हॉकी की नर्सरी से 20 वर्षीय रेणुका यादव शामिल हुई हैं। वे मिड हाॅफ फील्ड पोजिशन पर खेलती हैं। तीन साल से सीनियर इंडिया हॉकी कैंप में है। रेणुका का चयन स्पेन में होने वाली हॉकी टेस्ट सीरीज के लिए हुआ है। दो दिन पहले ही इसकी औपचारिक घोषणा हॉकी इंडिया ने की है। टीम 9 फरवरी को स्पेन रवाना होगी।
इंडिया टीम की घोषणा के बाद जब दैनिक भास्कर ने रेणुका से बात की तो उसने 8 साल के संघर्ष की कहानी बताई। अब आगे की कहानी रेणुका की जुबानी...मुझे बचपन से ही हॉकी पसंद है। जब मैं दूध बेचने साइकिल से जाती थी, तो म्युनिसिपल स्कूल ग्राउंड में हॉकी का मैच चल रहा होता था। साइकिल खड़ी करके मैच देखती। एक दिन वहां मैं कोच भूषण साव सर से मिली। सर ने मुझसे पूछा कि, हॉकी खेलना है क्या, मैंने तुरंत हां कह दिया और हॉकी की स्टिक थाम ली। मैंने घर में ये बात तीन महीने तक छिपाए रखी। मेरे खेल को देखते हुए कोच ने हॉकी स्टिक खरीदकर दिया। इसके बाद से नेशनल खेलने का दौर शुरू हुआ।
तीन साल से सीनियर इंडिया कैंप में
रेणुकाने अब तक 15 से ज्यादा नेशनल खेले हैं। 2009 में बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए साई ग्वालियर गई। यहां से जूनियर महिला हॉकी टीम में शामिल हुई। इस दौरान स्कॉटलैंड में हुए टूर्नामेंट में टीम को जीत दिलाई। 2013 तक जूनियर टीम के साथ रही। जुलाई 2013 में उनका सलेक्शन सीनियर इंडिया टीम के कैंप के लिए हुआ। तीन साल तक टीम में शामिल होने का इंतजार किया। अब उन्हें इंडिया टीम में जगह मिली।
रेणुका अभी दिल्ली कैंप में है।
रेणुका अभी सेंट्रल रेलवे में टीसी
खेलकोटे से रेणुका काे सेंट्रल रेलवे में टिकट चेकर की नौकरी मिली। अभी उसकी ड्यूटी मुंबई जोन में लगी है। इससे पहले परिवार में किसी ने सरकारी नौकरी नहीं की थी। रेणुका ने भी इंडिया टीम में शामिल होने का लक्ष्य बनाया और सीनियर टीम के कैंप में रहते हुए जॉब मिल गई। घर में छोटा भाई कोमल, मां कांति यादव और पापा मोतीलाल यादव हैं।
बहुत गरीबी देखी है, इसलिए आज यहां हूं
रेणुकाकहती है, इस पूरे दौर में मैंने गरीबी देखी है। नेशनल खेलने जाती थी तो मेरे पास पैसे नहीं होते थे। इनाम से मिले पैसे और जूते ही पहनती थी। 2009 में जब मेरा सलेक्शन जूनियर इंडिया टीम के लिए हुआ, तब मेरे पास पासपोर्ट नहीं था। इसे बनाने के लिए पैसे भी नहीं थे। तब भी मुझे मेरे प्रशिक्षकों ने मदद की। मां-बाबूजी दूध बेच कर घर चलाते थे। अब बाबूजी की तबीयत खराब है। मां दूसरे के घर झाड़ू-पोंछा करती है। इसलिए मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया, कि मुझे इसी खेल में आगे जाना है।
राजनांदगांव में रेणुका का घर, बाहर खड़े बीमार पिता।