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परदे के पीछे होगी असली लड़ाई, दिग्गज रणनीति बनाने में जुटे

7 वर्ष पहले
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इसबार दुर्ग महापौर का चुनाव काफी कुछ क्रिकेट के किसी रोमांचक मैच की तरह ही होने के आसार हैं। मैच की तरह की हर पल कुछ नया और चौकाने वाला हो सकता है। यह दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी की घोषणा में भी देखने में आया। अंतर केवल ये रहेगा कि क्रिकेट में मैच से पहले इंडिया टीम के महारथियों धोनी, विराट, रैना और प्रतिद्वंद्वी टीम से सोएब मलिक, युनूस खान, शाहिद के चेहरों को आमने सामने दिखा दिया जाता है, इसमें असली महारथी दिखाए ही नहीं जाएंगे। उनकी जगह उनका चेहरा दिखाया जाएगा जिन्हें टिकट दिया गया है। महारदी परदे के पीछे रहेंगे, लेकिन उनके दखल का स्पष्ट अहसास होगा। इस चुनाव की एक खासियत ये भी है कि जिन्हें टिकट मिला है उनके आका भी ये महारथी ही हैं।

अक्सर दिल्ली में रहने वाली सासंद सरोज पांडे पिछले लगभग दस दिन से दुर्ग में ही हैं। टिकट वितरण से पूर्व और उसके बाद की स्थिति पर उनकी बारीक नजर है। भाजपा की केंडिडेट चंद्रिका चंद्राकर उनके गुट से ही हैं। चंद्रिका उम्र में भले ही उनसे बड़ी है, लेकिन उनकी सहेली जैसी ही हैं। उनकी नजदीकी की एक खास वजह ये है कि जब सरोज पांडे 1999 में महापौर बनी तब उन्हें शुरूआत में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। तब चंद्रिका के पति र|ेश चंद्राकर जो केवल पार्षद ही थे, ने उनका हमेशा साथ दिया। तब दुर्ग निगम में भाजपा की राजनीति चौतरफा चल रही थी। निगम में भूतपूर्व सांसद स्वर्गीय ताराचंद साहू, पूर्व मंत्री हेमचंद यादव और सभापति डोमार वर्मा के लोग बैठे हुए थे। सामने मजबूत और आक्रामक विपक्ष जिसमें र|ाकर राव, मदन जैन, देव कुमार जंघेल जैसे लोग थे। सरोज कई बार सामान्य सभा की बैठक में अलग-थलग पड़ जाती थीं। उन्होंने पार्षदों को एमआईसी सदस्य बनाकर अपने पक्ष में करने की कोशिश की, लेकिन एमआईसी में भी दूसरे गुट के लोगों को लेना पड़ा। पर र|ेश ने एमआईसी में भी उनका साथ दिया।