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1918 में मिला था दुर्ग को नगर पालिका का दर्जा, 81 में बना निगम

7 वर्ष पहले
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क्याआप जानते हैं, कि दुर्ग के नगर पालिक निगम बनने के बाद करीब 10 साल तक महापौर का कार्यकाल केवल एक साल रहा। हर साल महापौर बदल जाते थे। एक मौका ऐसा भी आया, जब केवल छह महीनों के लिए महापौर बनाया गया। इतना ही नहीं महापौर का चुनाव जनता नहीं पार्षद करते थे। उसमें चुनकर आया पार्षद ही महापौर बना करता था। वर्ष 1918 में दुर्ग को पालिका का दर्जा मिला। वहीं वर्ष 1981 में दुर्ग नगर पालिक निगम बना। इसके बाद वर्तमान में चुन कर आने वाला महापौर शहर का 9 वां महापौर होगा।

दुर्ग निकाय चुनाव हमेशा से सुर्खियों में रहा। कभी कांग्रेस के कब्जे में रहे निगम पर करीब 15 सालों से बीजेपी का कब्जा है। दो बार लगातार महापौर सरोज पांडेय बनी। इसके बाद डॉ. शिवकुमार तमेर वर्तमान में महापौर हैं। उनके पूर्व दस अगस्त 1983 से पांच नवंबर 1983 तक दुर्ग निगम के पहले महापौर सुच्चा सिंह ढिल्लो रहे। उनके बाद 23 नवंबर 1983 से आठ फरवरी 1984 तक आलमदास गायकवाड़, नौ अगस्त 1984 से आठ अगस्त 1985 तक गोविंद धींगरा, नौ अगस्त 1985 से सात अगस्त 1987 तक दो बार लगातार शंकर लाल ताम्रकार महापौर रहे। जनता पहली बार महापौर चुनकर सरोज पांडेय को निगम परिषद में भेजा। वे छह जनवरी 2000 से पांच जनवरी 2005 तक पहली बार छह जनवरी 2005 से चार जनवरी 2010 तक दूसरी बार महापौर निर्वाचित हुईं।

हमेशा से चर्चा में रहे वार्ड

निगमगठन के बाद से तीन वार्ड ऐसे हैं, जो हमेशा से सुर्खियों में रहा। इनमें वार्ड-छह बैगापारा जहां से अब तक कोई भी राजनीतिक पार्टी का प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पाया है। यहां हमेशा निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत हासिल की। इसमें बिसे यादव, शिव चंद्राकर, मनीष यादव जैसे नाम शामिल हैं। मनीष यादव वर्तमान पार्षद हैं, जिन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है। इधर तकियापारा वार्ड-आठ से वर्तमान पार्षद तरन्नुम कुरैशी को छोड़कर निर्दलीय चुनाव लड़ने वालों ने जीत हासिल की। इनमें शबी पटेल, मोहम्मद जफर खान, अब्दुल गनी, दो बार विल्सन डिसूजा पार्षद रहे। इसी प्रकार वार्ड-23 से भी निर्दलीय पार्षद चुनकर आते रहे हैं। इनमें विनोद मून, विनोद सिंह, मीना सिंह जैसे नाम शामिल हैं।