पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • सुबह छह बजे, रेलवे स्टेशन

सुबह छह बजे, रेलवे स्टेशन

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
भई.. दुर्गमें बड़ी उठापटक हो गई है। जिनकी टिकट पक्की थी.. उनकी भी कट गई। रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहे एक युवा ने तान छेड़ी। क्यों, तुम्हारा कौन करीबी निपट गया जो इतनी चिंता कर रहे हो। दूसरे युवा ने चुटकी ली। इस पर पहले ने कहा- अरे यार, करीबी वाली बात नहीं कर रहा। मैं तो हालात के बारे में कह रहा हूं। मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूं, जिन्होंने बैनर-पोस्टर छपवाने के ऑर्डर कर दिए थे। लेकिन मायूसी हाथ लगी। अरे राजनीति में ऐसा होता है। और दुर्ग तो इसके लिए जाना जाता है। दूसरे युवा ने सांत्वना देने वाले लहजे में कहा। इतने में पहले वाले फिर अफसोस जाहिर किया। कहा- कुछ ने तो नामांकन तक भर दिए थे। कल से चेहरा मायूस दिख रहा है। इस पर दूसरे युवा ने टोका। भाई.. फिर पूरी बात तुम नहीं जानते। नामांकन इसलिए भरा है ताकि चुनाव के बहाने जेब में कुछ जाए। कल ही एक भाई साहब मिले थे। उन्होंने बताया कि कुछ ने नाम वापस लेने के लिए अप्रोच किया है। रकम भी ऑफर कर रहे हैं। इस पर पहला युवा चौंका- क्या बात कर रहे हो... ऐसा भी होता है क्या..? दूसरे ने जवाब दिया- ऐसा ही होता है भाई साहब। इससे पहले कि पहला युवा इस पर प्रतिक्रिया दे पाता। एक बुजुर्ग ने हस्तक्षएप किया। बेटा ये तो तुम ठीक कह रहे हो। देश की राजनीति आज तक इससे उबर नहीं पाई। तुम युवा ये कर सकते हो... लेकिन चुनाव लड़ने के लिए भी तो आगे आना पड़ेगा। यह सुनते ही पहला युवा बोला... दादाजी... बात तो आप ठीक कह रहे हैं। हमारे युवा साथियों ने तो टिकट भी मांगा था.. लेकिन आकाओं ने यह कहकर मना कर दिया कि पहले अनुभवी हो जाओ। उसके बाद टिकट मिलेगी। यह तो राजनीति की रीत है। इतने में ट्रेन आने की सूचना डिस्पले होने लगी। जगह मिलने मिलने की चिंता में कदम इंजन के ठीक बाद वाले डिब्बे की तलाश में कदम आगे बढ़ गए।

हम भी वहीं मौजूद थे