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बीएआरसी बनाएगा भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी

7 वर्ष पहले
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छत्रपति शिवाजी इंस्टीट्यूट टेक्नालॉजी में वैज्ञानिकों ने उर्जा विकसित करने का विकल्प सुझाया।

सिटीरिपोर्टर| दुर्ग

छत्रपतिशिवाजी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी में सोमवार को आयोजित आउटरिच प्रोग्राम में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, मुंबई के वैज्ञानिकों ने बताया कि बीएआरसी के द्वारा न्यूक्लीयर टेक्नालॉजी से उर्जा विकसित करने का कार्यक्रम तीन चरणों में किया जा रहा है। जिसके पूर्ण होते ही भारत ऊर्जा के क्षेत्र में स्वावलंबी बन जाएगा और आने वाले कई वर्षों तक भारत में बिजली की कमी महसूस नहीं होगी। इसके अलावा बीएआरसी सुरक्षा, खाद्य संरक्षण, जल शुद्धिकरण, कृषि सहित कई ऐसे क्षेत्रों में कार्य कर रहा जो सीधे आम जनता से जूड़ा हुआ है। इस अवसर पर बीएआरसी के द्वारा विकसित उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई गई। जिसके बारे में अनुसंधान केंद्र के सदस्यों ने विद्यार्थियों को विस्तार पूर्वक जानकारी भी दी। इसी क्रम में डॉ अमित भटनागर, डॉ डीबी नायक ने भी विद्यार्थियों को बीएआरसी की उपलब्धियों से अवगत कराया और परमाणु उर्जा के क्षेत्र में कैरियर की जानकारी दी। सीएसआईटी के चेयरमेन अजय वर्मा ने भी विद्यार्थियों को बीएआरसी से जुड़ने प्रेरित किया और कहा कि बीएआरसी के उद्देश्य में उनकी संस्था हमेशा सहयोग करेगी।

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के परमाणु उर्जा विभाग इस साल हीरक जयंती उत्सव मना रहा है। इसके तहत बीएआरसी की आेर से अपनी नवीनतम तकनीकों पर संगोष्ठी और प्रदर्शनी का राष्ट्र व्यापी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। जिसका उद्देश्य परमाणु उर्जा की लोगों के दैनिक जीवन में उपयोगिता से अवगत कराना है। इसके अंतर्गत सीएसआईटी के इलेक्ट्रानिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन विभाग के तत्वावधान में व्याख्यान का आयोजन हुआ। जिसमें बीएआरसी के रसायनिक समूह के डायरेक्टर डॉ बीएन जगताप ने बताया कि 2050 तक कोयले, आईल और यूरेनियम खत्म होने की कगार पर जाएंगे जिससे बिजली उत्पादन में काफी संकट जाएगी। लेकिन इसका भारत पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि इस समस्या निबटने के लिए बीएआरसी ने तीन चरणों की योजना बनाई जिसमें न्यूक्लीयर एनर्जी के उपयोग से बिजली उत्पादन किया जाएगा। इस योजना के पूर्ण होते ही भारत उर्जा के क्षेत्र में पूरी तरह स्वावलंबी बन जाएगा और सदियों तक हमारे देश को बिजली की कमी महसूस नहीं होगी। उन्होंने कहा कि बताया जाता है कि भारत दाल, दू