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आधुनिकता की चकाचौंध में गुम डंडा नाच की परंपरा

7 वर्ष पहले
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नहीं गूंजते महिलाओं के गीतों के सुर

भास्करन्यूज | अंकिरा

पौषमाह शुरू होते ही लोगों को सुगा-नाच एवं डंडा नाच देखने का इंतजार शुरू हो जाता था। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक इसका आनंद उठाते थे, पर अब आधुनिकता की चकाचौंध में ये परंपराए अब पूरी तरह विलुुप्त हो चुकी हैं।

लगभग 5 वर्ष हो गए तो युवतियों के गीतों के स्वर सुनने को मिल रहे हैं और ही युुवकों के डंडे से टकरा कर निकलने वाली आवाज जबकि पूर्व वर्षों में अनेक गांवों से सुआ नाच करने वालों युवतियों का समूह एवं डंडा नाच वाले युवकों का समूह पौष महीने भर क्षेत्र के गांवों में घूम-घूमकर मनोरंजन कराते थे। उल्लेखनीय है कि पौष पूर्णिमा को छेेरछेरा पर लोग वनभोज का आनंद लेेते हैं, जिससे धान की फसल घरों में रखने के बाद ग्रामीण इसके लिए उत्साहपूूर्वक तैयारी करते हैं। इस अवसर पर सुआ नाच काफी लोकप्रिय था, जिसमें युवतियां शामिल रहती थीं। एक युवती कांसे की बर्तन में सजाकर रखे सुुआ (तोता) की प्रतिमा सिर में रखकर बीच में खड़ी होेती थी एवं दोनों तरफ 5-5 युवतियां बारी-बारी से नृत्य करते हुए गीत गाती थीं। दूूर देश में रह रहे अपने प्रियतम केे पास सुआ के माध्यम से वियोग के संदेश सहित अनेक रसों से सुसज्जित मधुर गीत गाए जातेे थे। इन गीतों की अब केवल याद ही बाकी रह गई हैै। पौष माह शुरू होतेे ही लोग इसकी चर्चा करना नहीं भूलते। मनोज साव, अयोेध्या सिंह, विनाेद साहू सहित अनेक युवक-युुवतियों ने विलुप्त हो चुकी इस परंपरा पर गहरी चिंता व्यक्त की है। साथ ही इसे फिर से जीवंत करने के लिए हर संभव प्रयास करने पर विचार किया जा रहा है।

माह भर रहता था उत्सव का माहौल

टी-हो-टीके नाम से प्रसिद्ध डंडा नाच का भी यही हाल है, जिसमें 25-30 युवकों का समूह नृत्य करता था। इसमें एक-दो मांदर वादक रहते थे, बाकी युवक आकर्षक मनोरंजक वेशभूषा में दोनो हाथों में डंडा लिए नृत्य करते थे, जिसमें लय से डंडे के टकराने की मधुर आवाज उत्पन्न होती थी। इस नृत्य को ग्रामीण पूरे उत्साह से देखते थे। इन दलों को धान, चावल सहित अनेक खाद्य पदार्थ एवं रकम देकर ग्रामीण विदा करते थे। इसके बाद दलों में शामिल युवक इन सामग्रियों को एकत्र कर पौष पूर्णिमा के दिन वनभोज का आनंद लेते थे। इन परंपराओं से ग्रामीण क्षेत्रों में महीने भर उत्सव सा माहौल बना रहता था। जो अब सिमट कर एक ही दिन पौष पूर्णिमा