अच्छाई के लिए परिश्रम करना पड़ता है
रामचरितमानस में राम से पहले रावण के अवतार की कथा अाती है। रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। इसलिए बुराई का जन्म पहले और अच्छाई का जन्म बाद में हुआ है।
यह बात मानस मर्मज्ञ दामोदर दास महाराज में गोदरीपारा के राम-जानकी मंदिर में जारी नौ कुंडीय राम महायज्ञ संगीतमय रामचरित मानस कथा के चौथे दिन की कथा में कही। राम जन्मोत्सव का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा राम का चरित्र समाज में मर्यादा पुरूष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। राम के लिए मनु सतरूपा को तप करना पड़ा। इसके बाद प्रभु ने मनुष्य के रूप में जन्म लिया। यानी बुराई के लिए परिश्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती, जबकि अच्छाई के लिए परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए हमें को बुराई को दूर कर अच्छाई को ही अपनाना चाहिए, भले ही उसके लिए कितना भी परिश्रम करना पड़े। राम के जन्म की कथा में उन्होंने कहा कि नारद मुनि के श्राप के कारण प्रभु को मनुष्य का अवतार लेना पड़ा। नारद ने विश्वमोहिनी से ब्याह रचाने के लिए विष्णु से वरदान स्वरूप उनका रूप मांगा था। पर विष्णु ने उन्हें अपना रूप देकर, एक वानर का रूप दे दिया। इसलिए नारद का विवाह नहीं हो सका। तब नारद ने क्रोधवश प्रभु को श्राप दिया था कि जो रूप देकर आपने मुझे ठगा है उसी मनुष्य के रूप में आपको भी पृथ्वी पर आना होगा। कथा व्यास ने कहा प्रभु की कथा का रसास्वादन करने से जन्म-जन्मांतर के बंधन से मुक्ति मिलती है। हमें अपने व्यस्ततम समय से कुछ समय निकालकर प्रभु की सेवा में लगाना चाहिए। तभी हमारा मानव जीवन सार्थक हो सकेगा इससे समाज में ऊंचे मूल्यों के साथ स्वस्थ, समृद्ध समाज की स्थापना संभव हो सकेगी। उन्होंने भक्तों का आह्वान करते हुए कहा इस नौ दिवसीय यज्ञ के आयोजन से क्षेत्र के वातावरण में परिवर्तन होगा। उन्होंने मर्यादा की बात पर जोर देते हुए कहा कि झुकने से कोई छोटा नहीं होता बल्कि अहंकार कम होता है। भजन मन से करो तो उसमें जो रस मिलेगा उससे जीवन में नई चेतना का संचार होगा। यदि भजन में रम गए तो आप राग-द्वेष से परे हो जाएंगे।
ईश्वर से प्रेम के सिवाए सारे प्रेम स्वार्थ के हैं क्योंकि जब स्वार्थ पूरा हो जाता है तो प्रेम शिथिल हो जाता है। उन्होंने कहा शरीर के अपेक्षा अपने जीवात्मा का विचार करें। जो संपदा आपके पास है उसका उपयोग करें और जो नहीं है उसके लिए चिंता करें तो ईश्वर समय पर आपकी सहायता जरूर