पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • शस्त्र पूजा के साथ शुरू हुआ ऐतिहासिक दशहरा महोत्सव

शस्त्र पूजा के साथ शुरू हुआ ऐतिहासिक दशहरा महोत्सव

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
नवरात्रिके पहले दिन गुरूवार को शहर सहित जिले में स्थित माता के दरबार में दर्शन और पूजन के लिए भक्तों का तांता लगा रहा। यहां रियासत कालीन परंपरा के अनुसार शस्त्र पूजा कर ऐतिहासिक दशहरा महोत्सव की भी शुरूआत हो गई।

शहर के मां काली मंदिर सहित सिद्धपीठ सोगड़ा गम्हरिया आश्रमों के अलावा जिले के सभी देवी मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालु माता की अराधना के लिए पहुंच रहे थे। सभी मंदिरों में भक्तों की लंबी कतार और भीड़ थी। इसके अलावा कई श्रद्धालुओं ने अपने-अपने घरों में भी कलश स्थापना कर नवरात्रि व्रत प्रारंभ किया। पूरे 9 दिनों तक लोग माता की भक्ति में लीन रहेंगे। इधर, रियासत कालीन परंपरा के अनुसार मां काली मंदिर में तांत्रिक विधि से मां की अराधना शुरू हुई। जशपुर में नवरात्र प्रारंभ होते ही ऐतिहासिक दशहरा उत्सव भी शुरू हो जाता है। 10 दिनों तक चलने वाले दशहरा उत्सव की शुरूआत गुरूवार को पक्की डाड़ी में शस्त्र पूजन के साथ हुई। राजपरिवार के सांसद राजा रणविजय प्रताप सिंह देव सहित काली मंदिर एवं बालाजी मंदिर के आचार्य और मिरधा मंदिर से तलवार और अन्य शस्त्र ले कर पक्की डाड़ी पहुंचे। वहां आचार्य और पुस्तकाचार्यों ने स्नान कर नए वस्त्रों का धारण किया। इसके बाद पक्की डाड़ी में बनी वेदी पर कलश स्थापना की गई और विधि-विधान से शस्त्रों की पूजा-अर्चना कर आरती की गई। यहां से सभी लोग शस्त्र लेकर देवी मंदिर में पहुंचे और वहां पूजा-अर्चना की गई। ज्ञात हो कि रियासत काल से मां काली का विधि विधान से पूजा-अर्चना करने की परंपरा चली रही है। जिसे आज तक राजपरिवार के द्वारा निभाया जा रहा है। इसके अलावा श्री बालाजी मंदिर में भी दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगी रही। दोनों मंदिरोंं में दुर्गा सप्तशती और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ भी प्रारंभ किया गया। 9 दिनों तक दिन में बालाजी मंदिर और रात में मां काली मंदिर में हवन किया जाएगा। नवरात्रि के पहले दिन जगत जननी मां अंबे के शैल पुत्री के रूप की अराधना की गई।

मंदिरो में शस्त्र स्थापना

रियासतकाल में शस्त्रों का अहम स्थान होता था। नवरात्रि में राज परिवार द्वारा वैदिक एवं तांत्रिक विधि के साथ पूजा-अर्चना विधि विधान के साथ की जाती है। यह परंपरा आज भी कायम है। इस संबंध में आचार्य पं. नरेश मिश्र ने बताया कि पक्की डाड़ी से लाकर शस्त्रों की स्थापना मंदिरों में की गई