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4 हजार हेक्टेयर खेतों में लहलहाई सरसों की फसल
जिलेके किसानों के खेत में पीले फूलों से खिली सरसों की फसल मुस्कुराने लगी है। मौसम ने साथ दिया तो इस वर्ष किसान सरसों की बंफर फसल उत्पादन की संभावना जता रहे हैं। जिले में पिछले पांच वर्षों में लगातार बढ़ रहा है रकबा।जिले में सरसों के अच्छे पैदावार की उम्मीद की जा रही है।
किसानों के खेतों में सरसों के फूल अब लहलहाने लगे हैं। सरसों उत्पादन के लिए जिले में अनुकूल जलवायु है। कृषि विभाग के सांख्यिकी अधिकारी के तिर्की ने बताया कि सरसों का उत्पादन समशीतोष्ण जलवायु में होता हैं। जिले के पाठ क्षेत्रों में किसान सबसे अधिक सरसों की पैदावार करते है। जिले में सरसों उत्पादन करने के लिए मनोरा, जशपुर, सन्ना, सोनक्यारी, आस्ता, पण्ड्रापाठ, रौनी, छिछली, लोखंडी, पैंकू, गलौंड़ा आदि क्षेत्र प्रमुख है। वर्तमान में किसानों के खेतों में सरसों की फसल लहलहाने लगी है। इस वर्ष सरसों के उत्पादन क्षेत्र में भी बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले कुछ वर्षों से जिले के किसान सरसों उत्पादन से जुड़े हैं। साल दर साल सरसों के उत्पादन क्षेत्र में बढ़ोत्तरी हो रही है। कृषि विभाग भी सरसों उत्पादन को किसानों के अतिरिक्त आय का जरिया बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसके तहत किसानों को सरसों से होने वाले लाभ की बाते बताई जा रहीं हैं। सरसों उत्पादन करने वाले किसानों को देख कर बाकी किसान भी सरसों की खेती को अपना रहें हैं। क्षेत्र में पहले किसान सरसों का उत्पादन सीमित मात्रा में सिर्फ भाजी के लिए करते थे और किसान कभी बाडिय़ों में भाजी प्राप्त करने के लिए सरसों लगाया करते थे। सरसों की भाजी बाजार में बेचकर किसानों को थोड़ी बहुत आमदनी होती थी, लेकिन अब बड़े पैमाने पर जिले में सरसों की खेती शुरू कर दी गई है। सरसों की खेती कर रहे किसान अब सिर्फ भाजी बेचकर आमदनी नहीं कर रहे, बल्कि गांव में सरसों से तेल भी निकाला जा रहा है। ग्रामीण सरसों को गांव की मंडी में ही व्यापारियों को बेचते हैं। विदित हो कि क्षेत्र के किसान पहले सिर्फ वर्षा पर आधारित खरीफ फसल की ही पैदावार करते थे। वे रबी फसलों का उत्पादन नहीं कर पाते थे। जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा थी, वे ही रबी फसल में सामान्य तौर पर गेहूं का उत्पादन करते थे। ऐसी स्थिति में सरसों की खेती किसानों के लिए बेहतर विकल्प के रूप में उभरी है। सरसों की खेती में अधिक पानी की आवश्यकता नही