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तमाम संकटों के बाद भी हिंदी हो रही समृद्ध

7 वर्ष पहले
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आज का दौर तकनीकी क्षेत्र में तेजी से बढ़ते युवाओं का है। इस दौर में हिंदी की उपेक्षा किसी से छिपी नहीं है। राजभाषा के रूप में हिंदी की स्थिति चिंताजनक है। हिंदी आजतक तकनीकी भाषा भी नहीं बन सकी है। युवाओं में हिंदी भाषा को लेकर सम्मान जरूर है। पर व्यवहार में हिंदी भाषा को और अधिक उतारने की जरूरत है। युवाओं को भी भरोसा है कि आने वाले समय में तमाम संकटों के बाद भी हिंदी और अधिक समृद्ध होगी।

हिंदी भाषा की स्थिति को लेकर बहस कोई नई नहीं है। हिंदी को लेकर चिंता करने वाले हिंदी भाषा का संघर्ष दूसरी भाषाओं, बोलियों और स्थानीय भाषाओं से बताते हैं। पर वास्तव में ऐसा है नहीं। भाषाओं या बोलियों का आपस में कोई संघर्ष कभी रहा ही नहीं। भाषा एक संस्कृति है और एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति से परस्पर संघर्ष नहीं होता। दो संस्कृतियां जब आपस में मिलती हैं, तो दोनों एक-दूसरे से कुछ कुछ ग्रहण करती हैं। इससे संस्कृति समृद्ध होती है। यही बात हिंदी भाषा के साथ भी लागू होती है। बोलियों और स्थानीय भाषाओं से ही हिंदी बोलचाल की भाषा के रूप में समृद्ध हो रही है। चाहे वह मराठी, भोजपुरी, मैथिल, छत्तीसगढ़ी आदि स्थानीय भाषाएं हों या अन्य बोलियां, इनसे हिंदी ने काफी कुछ ग्रहण किया है। हालांकि इसके बावजूद हिंदी ज्ञान की भाषा के रूप में काफी पीछे हो चली है, जो हिंदी प्रेमियों के लिए चिंता की बात है। आधुनिक युग इलेक्ट्रॉनिक संचार साधनों उन्नत तकनीक का है।

इन तकनीकों को विकसित करने में अंग्रेजी भाषा की ही भूमिका रही है। हिंदी भाषा कभी भी तकनीकी भाषा नहीं बन पाई। हिंदी भाषा की वर्तमान दशा और भविष्य की संभावनाओं पर भास्कर ने कुछ युवाओं से चर्चा की।

अभी भी दिखती है गुलामी की छाप

उमाशंकरघाटोल का मानना है कि हमारे देश में अब भी गुलामी की छाप है। पाश्चात्य देशों की भाषाओं का प्रभाव भी हिंदी पर पड़ा है। इन सबके बावजूद भी हिंदी भाषा अपने आप में काफी समृद्ध है। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा की सरकारी उपेक्षा हुई है। आज भी न्यायालय, संसद, प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जाती है। इससे देशवासियों में भ्रम की स्थिति है कि वे हिंदी भाषा को अपनाएं या अंग्रेजी का अनुशरण करें। उन्होंने कहा कि सरकारी नीतियां काफी हद तक हिंदी भाषा को प्रभावित कर रहीं हैं।

इसके बाद भी वे हिंदी का भविष्य काफी उज्