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शिकार के लिए आज भी कई आदिवासी पालते हैं बाज

7 वर्ष पहले
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पुरानेजमाने में छोटे पशु-पक्षियों के शिकार के लिए बाज का उपयोग किया जाता था। आज भी इस क्षेत्र के कई गांवों में आदिवासी शिकार के लिए बाज का सहारा ले रहे हैं।

बाज एक प्राकृतिक शिकारी पक्षी है, जिस बाज का उपयोग ग्रामीण शिकार के लिए करते हैं, उसे स्थानीय बोली में छछन या शिकारा कहा जाता है। यह छोटी प्रजाति का सफेद बाज है। इसकी लंबाई 1 से डेढ़ फीट वजन करीब 2 किलो है। पहले इस प्रजाति का बाज जिले में काफी दिखते थे। पर अब इनकी संख्या कम हो गई है। ग्रामीण लकु राम ने बताया कि ग्रामीण जिस पेड़ में बाज अंडे देता है, उस पेड़ पर नजर रखते हैं। जब अंडे से बच्चा निकलता है और जब वह उड़ने को तैयार हो जाता है, तो ग्रामीण उसे पकड़ने का इंतजाम करते हैं। जब बाज का बच्चा डैना फैला कर उड़ने की तैयारी में रहता है, तब उसे पकड़ लेते हैं। इसे पालकर ग्रामीण आदिवासी शिकार के लिए उपयोग करते हैं। हालांकि लकु राम ने बाज नहीं पाला है। जिले के बगीचा, कामारिमा, सन्ना, नारायणपुर, बादलखोल अभयारण्य, जशपुर में इस प्रजाति का बाज पाया जाता है।

कैसे करते हैं शिकार

ढोढरअंबाके रहने वाले जीवन किशोर ने बताया कि बाज के पैर में रस्सी बांधकर रखा जाता है। कोई छोटी चिड़िया देखने पर आदिवासी बाज को उस पर छोड़ देते हैं। बाज उस पक्षी पर झपट्टा मार कर नीचे गिरा देता है। इसके बाद ग्रामीण जाकर उस घायल पक्षी को पकड़ लेते हैं। बाज आसमान में उड़ते हुए पक्षी को बड़ी आसानी से शिकार कर दबोच लेता है। इसकी तेज निगाहें और सटीक निशाना कभी चूकता नहीं। बाज के पंजे में जबरदस्त पकड़ होती है। उन्होंने बताया कि बाज को बचपन से ही शिकार करने की ट्रेनिंग दी जाती है।

गैर कानूनी है बाज पालना

पशु-पक्षियोंके संरक्षण की दिशा में काम कर रही संस्था ग्रीन नेचर वेलफेयर सोसायटी के संस्थापक कैसर हुसैन का कहना है कि यह बाज बस्तर, सरगुजा क्षेत्र के जंगलों में पाया जाता है। वन्य प्राणी अधिनियम 1972 के अनुसार इसका शिकार करना व्यक्तिगत रूप से पालना गैर कानूनी है।





इस पर रोक लगनी चाहिए।