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‘भाषा व बोलियों का संरक्षण जरूरी’

5 वर्ष पहले
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छत्तीसगढ़ी के प्रचार-प्रसार व उसे राजकाज की भाषा बनाने के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग लगातार प्रयासरत है। भाषा और बोलियों के संरक्षण व संवर्धन के लिए उसे लिपिबद्ध करना व उसका प्रकाशन कराना जरूरी है। यह बातें शुक्रवार की सुबह स्थानीय रेस्ट हाउस में राजेश तिवारी ने कहीं। उन्हें राजभाषा आयोग ने जशपुर, सूरजपुर, बलरामपुर, कोरिया व सरगुजा जिले का संयोजक बनाया है।

उल्लेखनीय है कि छग राजभाषा आयोग का चौथा प्रांतीय सम्मेलन कोरबा में 19 व 20 फरवरी को आयोजित किया गया है। जिसके सिलसिले में श्री तिवारी जशपुर पहुंचे थे। श्री तिवारी ने यहां के साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों से मुलाकात की और उन्हें प्रांतीय सम्मेलन में आने का न्योता दिया। रेस्ट हाउस में दैनिक भास्कर से विशेष चर्चा में श्री तिवारी ने बताया कि राजभाषा आयोग छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने, उसे राजकाज की भाषा बनाने के उद्देश्य से प्रांतीय सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। जिसमें कई सत्र आयोजित किए जाएंगे। सम्मेलन में छत्तीसगढ़ी व हिंदी भाषा के विद्वान विभिन्न विषयों पर अपना व्याख्यान देंगे। चर्चा में उन्होंने बताया कि प्रदेश में छत्तीसगढ़ी भाषा के अलावा जितनी भी बोलियां हैं, उनके संरक्षण व संवर्धन की दिशा में आयोग काम कर रहा है। प्रदेश के दूरस्थ अंचल में भी कई विद्वान हैं जो इन बोलियों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहे हैं। साथ ही वे हिंदी भाषा की सेवा विभिन्न माध्यमों से कर रहे हैं। पर यह जरूरी है कि जो प्रयास हो रहे हैं, वे लिखित रूप में भी सामने आएं और उनका प्रकाशन हो। क्योंकि भाषा और बोलियों के संरक्षण व संवर्धन के लिए प्रकाशन जरूरी है। श्री तिवारी ने कहा कि आयोग ने उन्हें संयोजक की जिम्मेदारी दी है। जिससे उनका दायित्व है कि वे इस अंचल के भी साहित्यकारों व साहित्य प्रेमियों का प्रतिनिधित्व प्रांतीय सम्मेलन में करें व ऐसे लोगों को आयोग के साथ जोड़ें। जिससे छत्तीसगढ़ी भाषा को और अधिक समृद्ध किया जाए। यहां साहित्यकारों व साहित्यप्रेमियों से मिलने के बाद श्री तिवारी ने कहा कि यहां भी साहित्य में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। प्रदेश के दूरस्थ अंचल में भी साहित्यिक गतिविधियां होती रहें, बस यह प्रयास होना चाहिए।

इंटरव्यू
राजेश तिवारी

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