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गरीबों का मिट्‌टी तेल वाहनों में डाला जा रहा

5 वर्ष पहले
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जिले भर में परिवहन में लगे वाहनों में इन दिनों डीजल की जगह मिट्टीतेल का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके कारण मिट्‌टीतेल की कालाबाजारी को बढ़ावा मिल रहा है। साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान हो रहा है। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी विभागीय अधिकारियों को ना हो पर वे शायद इस ओर कुछ करना ही नहीं चाहते हैं।

कोरिया जिले के लगभग सभी ग्राम पंचायतों में स्थिति उचित मूल्य की दुकानों से मिट्‌टीतेल का कालाबाजार जोरों पर है। गरीबों को तो मिट्‌टीतेल नहीं मिल पाता पर ट्रांसपोर्टिंग में लगे अधिकतर वाहन इन दिनों मिट्‌टीतेल से ही चल रहे हैं। यदि जिले में मिट्‌टीतेल की किल्लत है या आपूर्ति को लेकर कोई समस्या है तो वाहन चालकों को कहां से मिट्‌टीतेल मिलता है। मिट्‌टीतेल से चलने वाले वाहनों के कारण पर्यावरण को जमकर नुकसान पहुंचता है। इन दिनों कटोरा साईडिंग से कटकोना, पाण्डवपारा व झिलिमिली कोयला खदान के बीच कोल परिवहन में चलने वाले अधिकतर डंपरों, ट्रेलरों व सवारी जीप आदि में ईंधन के रूप में मिट्टीतेल का ही उपयोग किया जा रहा है। पर विभागीय अधिकारियों के द्वारा इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं किया जा रहा है। मिट्टी तेल से चलने वाली वाहनों से राहगीतों को भी परेशानी होती है।

9 की जगह 25 रुपए प्रति लीटर में बेच देते हैं
पटना क्षेत्र के विभिन्न ग्राम पंचायतों में संचालित उचित मूल्य की दुकानों का संचालन करने की जिम्मेदरी जिले के संबंधित अधिकारीयों के द्वारा महिला स्वयं सहायता समूहों को दी गई है। इसका उद्देश्य समूह से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक लाभ पहुंचाना है। लेकिन सभी उचित मूल्य की दुकानों का संचालन स्वयं सहायता समूह की महिलाऐं नहीं कर रही हैं। अधिकतर जगह केवल उनके समूह के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्षेत्र के उचित मूल्य की दुकानों का संचालन करने वाले लोगों में अधिकांष लोग राजनीति से जुड़े़ हुए हैं और वे गरीबों को 9 रुपए प्रति लीटर में मिलने वाले मिट्‌टीतेल को ट्रान्सपोर्टरों, वाहन मालिकों के पास 25 रुपए प्रति लिटर के हिसाब से बेच देते हैं। इस तरह वे जमकर मुनाफा कमाते हैं। वाहन चालक उसका उपयोग चार पहिया वाहनों को चलाने में करते हैं।

इस तरह वाहनों में डीजल की तरह मिट्‌टीतेल डालकर चलाया जा रहा है

रंग बदल दिया जाता है
चार पहिया वाहनों में 250 लिटर मिट्टी तेल व 1 लिटर सरसों तेल डाला जाता है। इसके कारण मिट्‌टीतेल का रंग डीजल की तरह हो जाता है। इसी तरह मिट्टी तेल में मोबिल मिलाकर व केमिकल मिलाकर भी मिट्टी तेल का रंग बदल दिया जाता है। इसके बाद उसे वाहनों में डालकर चलाया जाता है। जिले के संबंधित आला अधिकारी भी इनकी ओर ध्यान नहीं देते। यही वजह है कि क्षेत्र में मिट्‌टीतेल से चलने वाले वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही है।

जांच के नाम पर खाना पूर्ति

पटना से बैकुन्ठपुर के बीच दो पहिया व चार पहिया वाहनों की जांच करते ट्रैफिक विभाग के अधिकारी कर्मचारी आसानी से देखे जा सकते हैं। हर रोज होने वाले इस जांच के कारण वाहन चालक परेषान भी होते हैं। पर जांच के नाम पर केवल वाहनों के दस्तावेज व ड्राईविंग लाईसेंस की जांच की जाती है और चालान काट कर छोड़ दिया जाता है। वे बड़े वाहनों में डीजल या पेट्रोल की जगह मिट्‌टीतेल के उपयोग की जांच नहीं करते हैं। यही कारण है कि ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने के कारण वे बेखौफ होकर मिट्‌टीतेल से वाहन चला रहे हैं।

अधिकारी वाहनों की जांच करते समय डीजल टंकी की जांच नहीं करते हैं
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