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डिस्पोजल के बढ़ते उपयोग से पर्यावरण को खतरा
शादियोंका आयोजन हो या फिर चाय की दुकान, शहर में हर कहीं पर डिस्पोजेबल सामग्री से ही काम चलाया जा रहा है। आलम यह है कि धीरे-धीरे डिस्पोजल सामग्री भी तरह-तरह के आकार प्रकार एवं अच्छी क्वालिटी की बनने लगी हैं। इसका चलन अनिवार्य तो हो गया है, पर इसके उपयोग के बाद लापरवाही से फेंक देने से यह कचरा नागरिकों की परेशानी का सबब बनता जा रहा है।
नगर पंचायत की सफाई व्यवस्था की स्थिति भी सुदृढ़ नहीं रहने से प्लास्टिक डिस्पोजल का कचरा सार्वजनिक स्थानों पर बिखरा रहने लगा है। यहां के प्रमुख पर्यावरणविद श्रवण अग्रवाल का कहना है कि प्लास्टिक डिस्पोजल का कचरा जनजीवन के लिए खतरनाक है और स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके बावजूद भी इसे ही पसंद किया जा रहा है। शहर में रोजाना हजारों की तादाद में प्लास्टिक से बनी डिस्पोजल सामग्री बिक रही है। इधर, शादियों के सीजन में इनकी बिक्री लाखों में पहुंच जाती है। इससे पर्यावरण का प्रदूषण भी होता है। पशु चिकित्सा विभाग में पदस्थ केके पटेल का कहना है कि इन दिनों शहर के वैवाहिक स्थलों के इर्द गिर्द उपयोग की हुई हजारों डिस्पोजल ग्लास पड़ी रहती है। मवेशियों का झुंड जूठन के साथ-साथ इन प्लास्टिक को खा लेता है। पर उनके नष्ट नहीं होने ये मवेशी के पेट में जमा होता जाता है और यह उनके स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव डालता है। कभी कभी इनसे मवेशियों की मौत तक हो जाती है, पर इसके बावजूद लोग इसका उपयोग करने से नहीं चूक रहे हैं। पर्यावरण से जुड़ी इस समस्या के प्रति पूरे देश में छोटे बडे़ स्थानों पर शासकीय शिक्षण संस्थाओं एवं स्थानीय संस्थाओं द्वारा इस विकराल समस्या के प्रति समय-समय पर चर्चा, विचार, भाषण, नाटक, रैली के भी आयोजन होता रहता है,पर प्लास्टिक कचरा फैलाने वालों पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। कभी-कभी वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर नगर निकाय के अमले द्वारा पॉलिथीन थैलियों का उपयोग से बचने के लिए जागरूकता रैली की औपचारिकताएं पूरी कर दी जाती है, पर देखने में रहा है कि ये सभी प्रयास बौने साबित हो रहे है, क्योंकि पॉलिथीन की थैली और डिस्पोजेबल का उपयोग धड़ल्ले से नियंत्रित होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। हालांकि शहर में नगर निकाय और गांव में पंचायत के दायित्व में स्वच्छता कार्य आता है। इस प्रकार का अपशिष्ट पदार्थों को नष्ट करने के लिए नगर पंचायत के स्तर पर ट्रेचिंग