मानव मूल्यों के संरक्षण से भटकें
पितृपक्षका पखवाड़ा में हम केवल अपने बुजुर्गों के स्मरण तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि अंतिम दिन पितृपक्ष का समापन के बाद भी हमें मानवीय मूल्यों के सरंक्षण से नहीं भटकना चाहिए। यह बाते ज्योतिषाचार्य डा.शत्रुघ्न त्रिपाठी ने मंगलवार को किलकिलेश्वरधाम में आयोजित पितृपक्ष के समागम कार्यक्रम में कहीं।
उन्होंने कहा कि वास्तव में पितरों के माध्यम से मानवीय मूल्य के संरक्षण का संदेश मिलता है। हमें माता पिता का आदर एवं सेवा नित्य करनी चाहिए, क्योंकि तर्पण भी नित्यकर्म है। हमें पितरों के खान पान एवं आचरण व्यवहार का अनुसरण और उनके माध्यम से मनुष्य के मूल्य का पर्यालोचन करना चाहिए। माता पिता को देव एवं ऋषि की कोटि में रखकर साथ में तृप्त करना यह प्रतिपादित करता है कि हमें मृत पितरों के अपेक्षा जीवित पितरों को अधिक महत्व देकर मानव धर्म का पालन दृढ़ता से करनी चाहिए। डा.त्रिपाठी ने कहा कि भौतिक आघ्यात्मिक पक्ष के द्वारा दोष-गुणों का विवेचन करने लगते हैं, तब वह क्रमश: विज्ञान एवं ज्ञान की परिभाषा को परिलक्षित करता है। प्राचीन काल के धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व को आज के वैज्ञानिकों पर पड़े दबाव के रूप में देखा जा रहा है।
कईदृष्टि से वैज्ञानिकता -डॉ. त्रिपाठीने कहा कि कन्या राशि के सूर्य के 16 दिन का पितरों के लिए निर्धारण मुख्य रूप से सौर वर्ष मे एक विशेष कालखंड की वैज्ञानिकता को प्रदर्शित करता है। यह कालखंड पितृ लोगों के प्रति समर्पित किया गया है। जिसमें हम पितरों को स्मरण एवं उनके संस्कारों के प्रति आस्था सम्मान एवं कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। इसी तरह जल दान एवं पिंड दान में मुख्य रूप से दो वंश परंपरा का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है। जिसमें अनुवांशिकता के महत्व को अंगीकृत किया गया है।
स्वास्थलाभ की दृष्टि से वैज्ञानिकता - आश्विनमास चातुर्मास का अंतिम मास है। जिसमे दृष्टि का जल शुद्ध एवं एकत्रित हो जाता है। नदियों के वनस्पतियों एवं विविध प्रकार के औषधियों से मिश्रित हुआ जल चमड़ा एवं कफज रोगों के नाश के लिए उत्तम होता है। लगातार प्रातः काल का स्नान भी शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता को और अधिक मजबूत करता है। 16 दिनों तक एक नियम विशेष की परिधि में रहकर खान-पान, रहन-सहन, एवं सात्विक दिनचर्या से स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से वैज्ञानिकता
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