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पंचायत चुनाव में ...

6 वर्ष पहले
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पंचायत चुनाव में ...

कुछऐसा ही चौंकाने वाला परिणाम आया मस्तूरी जनपद पंचायत से। यहां महज 23 वर्ष की राजेश्वरी सारथी ने जनपद सदस्य क्रमांक 14 रिसदा से सदस्य का चुनाव जीत लिया। नगर पंचायत से नगर पालिका परिषद् बने रतनपुर के महामायापारा में रहने वाले आनंदराम सूर्यवंशी को अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि उनकी बेटी पूर्व अध्यक्ष को हराकर नगर पालिका अध्यक्ष बन गई है। यकीन भी आखिर कैसे हो, सूर्यवंशी परिवार पीढ़ियों से लोहारी बढ़ईगीरी कर गुजर-बसर करता रहा है। कभी राजनीति में आने के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। लेकिन 27 साल की बेटी आशा ने हिम्मत दिखाई और मिथक तोड़ दिया। बकौल आशा, उसे खुद कई बार भ्रष्ट शासन-प्रशासन की तस्वीर देखने को मिली। इसी से दु:खी होकर राजनीति में आई। आशा के पिता आनंद अपने भाई संतोष और अशोक के साथ लोहारी का काम करते हैं। रतनपुर और उसके आस-पास के गांवों के लोग बैलगाड़ियों के चक्के का पट्‌टा चढ़वाने उनके पास आते हैं। आनंद के पिता गोविंद और उसके दादा नकछेद भी यही काम करते थे। इधर, रतनपुर इलाके के मेलनाडीह की शारदा गढ़ेवाल की कहानी आशा से कुछ अलग है। शिक्षक पिता भरतलाल की असमय मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उसके कंधों पर गई। उसने शादी करने के बजाय गांव की सेवा का निर्णय लिया। वह खुद सिलाई-बुनाई का काम करती है और गांव की अन्य महिलाओं को आगे आने के लिए प्रेरित भी। पहली बार स्वतंत्र पंचायत का दर्जा मिला तो ग्रामीणों ने चुनाव के एक महीने पहले अपनी सरकार चुन ली। पंच तो निर्विरोध निर्वाचित हुए ही गांव की पढ़ी-लिखी शारदा गढ़ेवाल को आपसी सहमति से सरपंच निर्वाचित कर लिया। शारदा, उसके लिए पहले यकीन करना मुश्किल था, लेकिन जब ग्रामीणों ने भरोसा जताया है तो वह वहीं करेगी जो गांव के लिए सही होगा।

23की राजेश्वरी बनी जनपद सदस्य : महज23 वर्ष की राजेश्वरी सारथी ने मस्तूरी जनपद सदस्य क्रमांक 14 रिसदा से सदस्य का चुनाव जीतकर सभी को चौका दिया है। मस्तूरी सरपंच चमरू सारथी की बेटी राजेश्वरी ने बीए तक की पढ़ाई की है। 25 सदस्यों की टीम में उसे सबसे कम उम्र का सदस्य बताया जा रहा है। राजेश्वरी के राजनीति में आने का निर्णय उनके पिता चमरू ने लिया। रिसदा सीट एससी महिला के लिए आरक्षित हुआ तो चमरू ने राजेश्वरी को मैदान में उतारा। राजेश्वरी कहती है कि मस्तूरी इलाका पिछड़ा हुआ है और महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। पांच सालों में उनकी कोशिश रहेगी कि वह महिलाओं के हित के लिए अधिक से अधिक कार्य करे।

जिसमिट्‌टी में ...

संबंधितथानों में हत्या, चोरी, डकैती, नकबजनी जैसे प्रकरण रोजाना दर्ज होते थे। इनमें से कई मामले पुलिस आज तक नहीं सुलझा पाई है। फिर एक दौर ऐसा भी आया जो परिवर्तन का था। दरअसल, पढ़े-लिखे कुछ युवाओं ने अपने गांव की बदनाम पहचान को बदलने का बीड़ा उठाया। धीरे-धीरे हालात बदलने लगे। ग्रामीणों ने मेहनत करना शुरू कर दिया। इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिनके हाथ कभी शराब तो कभी गांजे और हथियारों की सप्लाई में रहे। दैनिक भास्कर टीम को चार ऐसे ही लोग मिले। चोरी के आरोप में जेल जा चुके पौंसरा गांव का कोमल सोनी का परिवार सुबह से ईंटें बनाने में जुटा दिखा। परिवार के ही एक सदस्य ने उन्हें इस काम के लिए प्रेरित किया, मदद की। इसी तरह पीपरा गांव में नदी के किनारे कल्लू सिंह का परिवार सुबह 5 बजे से ईंट बनाने मिट्‌टी गारता है। सभी सदस्य साचे में ढालकर इसे ईंटों में तब्दील करते हैं। धूप में सुखाकर आग में पकाना और फिर सप्लाई रोजाना का काम है। बकौल सोहन अब ध्यान इधर-उधर नहीं भटकता। पुलिस भी इस क्रांतिकारी परिवर्तन को कुछ ग्रामीण और मेहनतकश लोगाें की सकारात्मक सोच का नतीजा मानती है।

उपभोक्ताफोरम ...

दरअसल,सिर्फ 29 धाराओं वाले अधिनियम में उपभोक्ताओं की राहत के लिए कई प्रावधान हैं। बस, जरूरत है अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने की। फोरम में वाद दायर करने किसी वकील की जरूरत नहीं है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में 31 धाराएं थीं। 2002 में हुए संशोधन के बाद सिर्फ 29 धाराएं बची हैं। इस कानून ने रोजमर्रा लक्चरी के सामान खरीदने, डॉक्टर, इंजीनियर, दूरसंचार, बैंकिंग, बिजली, निर्माण समेत हर तरह की सेवाओं के मामले में कमी होने पर लोगों को राहत का रास्ता आसान कर दिया है। अधिनियम लागू होने से पहले तक ऐसे मामलों को सिविल कोर्ट में लगाने की मजबूरी होती थी। वकील करने पड़ते थे। तारीखें मिलती थीं। झंझट से बचने ज्यादातर लोग अधिकारों के लिए लड़ने की बजाय समझौते कर लिया करते थे। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद हालात बदले हैं। अब अपने अधिकारों को लेकर सजग रहने वाले लोग सेवा और उत्पाद में किसी तरह की कमी होने और संबंधित कंपनी या व्यक्ति से राहत नहीं मिलने पर उपभोक्ता फोरम में अर्जी लगाते हैं।

0केस- 1

जयाजीतीं, क्योंकि कागजात सहेज रखे थे

राजकिशोर नगर लिंगियाडीह की जया अग्रवाल को गायें पालने का शौक हुआ। उन्होंने बिजौर गांव में रहने वाले अर्जुन लाल कौशिक से चार गायों का सौदा किया। बेचने वाले ने लिखकर दिया गायें सीधी-सादी हैं। मारती नहीं, दूध भी देती हैं। घर लाते ही गायें मारने दौड़ने लगीं। कुछ दिन रखकर देखा, लेकिन रवैये में बदलाव नहीं हुआ। बेचने वाले ने शिकायत पर ध्यान नहीं दिया तो उपभोक्ता फोरम पहुंच गईं। फोरम ने अर्जुन लाल को पूरी कीमत के साथ जुर्माना देने का आदेश दिया है। जया की जीत के पीछे उनकी जागरूकता थी। उन्होंने खरीदी का इकरारनामा संभालकर रखा था।

केस-2

दीवारों की पुताई उधड़ी तो फोरम से न्याय मिला : तिफरामें रहने वाले एसके लोध ने जरहाभाठा के विकास पेंट मार्ट से नए मकान का वेदरकोट करवाया। एजेंसी ने पांच साल तक मकान में सीलन या दरारें नहीं आने की गारंटी दी, लेकिन कुछ महीनों बाद दिखने लगीं। बारिश में दीवारों से रिसाव होने लगा। शिकायत पर एजेंसी ने कोई कार्रवाई नहीं की तो लोध फोरम जा पहुंचे। फोरम ने पूरी कीमत के साथ जुर्माना देने का आदेश एजेंसी के संचालक को दिया है।

वकीलकी जरूरत नहीं, अाप भी लगा सकते हैं अर्जी: वर्ष1986 से पहले उपभोक्ताओं के सामने शिकायतों के लिए सिविल कोर्ट एकमात्र उपाय थीं। कोर्ट जाने वकील की जरूरत पड़ती थी। यहां मामलों की लंबी फेहरिश्त के बीच सुनवाई का नंबर सालों बाद आता था। इस परेशानी को देखते हुए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम बनाया गया। इसमें जिला, राज्य और केंद्र के स्तर पर फोरम का प्रावधान है। जिला स्तर पर 20 लाख रुपए तक के मामले प्रस्तुत किए जा सकते हैं। वहीं राज्य स्तर पर 20 लाख रुपए से लेकर 1 करोड़ रुपए और केंद्रीय स्तर के आयोग में 1 करोड़ रुपए से ज्यादा के मामले पेश किए जा सकते हैं। फोरम में किसी तरह फीस का नियम नहीं है। ही आपको वकील करने की जरूरत है। सादे कागज पर अपनी समस्या बताई जा सकती है। हां, दस्तावेज पुख्ता होने चाहिए। जैसे किसी भी सामान की खरीदी करने कैश मेमो यानी पक्का बिल ही लें। किराया आदि के मामलों में इकरारनामा साथ रखें, क्योंकि फोरम के फैसले सबूतों के आधार पर होते हैं।

आधुनिकद्रोणाचार्य ...

इसकेबाद गुरु ने शिष्य को पैरा एशियन गेम्स के लिए ट्रेनिंग दी। हालांकि इसके पहले सत्येंद्र के लिए आर्चरी यानी तीरंदाजी शब्द नया था। वह अपने गांव भरेवा गया और कुछ पढ़े-लिखे युवाओं से इस बारे में बात की। कुछ ने साफ कह दिया कि ऐसे ही कोई किसी को विदेश क्यों पहुंचाएगा। नसीहत मिली कि कहीं शहर में ले जाकर बेच आएगा, तुम उसके झांसे में मत आओ। गांव का ही एक युवक धर्मेंद्र के बारे में जानता था। उसने सत्येंद्र को बताया कि वह अच्छा तीरंदाज है और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुका है। इस बात ने सत्येंद्र को हौसला बढ़ाया और वह धर्मेंद्र के गांव सोढ़ी मराठी पहुंच गया। वहां पर धर्मेंद्र अभ्यास में जुटा था। उसके साथ गांव के कुछ किशोर और युवा भी थे। सत्येंद्र पहुंचा तो धर्मेंद्र भी खुश हुआ। इसके बाद शुरू हुआ तीरंदाजी विधा की शिक्षा का पाठ।

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