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रतनपुर की पहचान नेर शिल्प

6 वर्ष पहले
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कांसेके बर्तनों को रतनपुरिहा ब्रांड देकर पिछले 60 वर्षों से रामानुज कसेर अपने पुरखों से विरासत में मिले ‘नेर शिल्प’ को आगे बढ़ा रहे हैं। इसे वे नई पीढ़ी के युवाओं को सिखा रहे हैं ताकि रतनपुर की पहचान बन चुकी यह कला जीवित रह सके।

रामानुज कसेर ने बताया उनके यहां यह काम चार पीढ़ियों से किया जा रहा है। उनके पूर्वज मोहन साव दो सौ साल पहले उत्तरप्रदेश से आकर यहां बस गए थे। उन्हें तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने पुरस्कृत भी किया था। उन्हीं की तीसरी पीढ़ी में प्रहलाद कसेर हुए, जो रामानुज के पिता थे। उन्हीं से यह कला रामानुज को मिली। रामानुज ने बताया पहले मिट्‌टी का सांचा तैयार कर उस पर मोम का लेप चढ़ाया जाता है इस सांचे में पीछे छेद होता है इसमें से एक खास तापमान पर पिघले हुआ कांसा धीरे-धीरे सांचे में डाला जाता है। फिर इसे ठंडा होने दिया जाता है। फिर मिट्‌टी तोड़कर बर्तन को फाइल कुंद से खराद कर ब्रासो से चमकाया जाता है। इस तकनीक से मनचाहे आकार-प्रकार डिजाइन के बर्तन बनाए जा सकते हैं।

आजभी है बर्तनों की मांग: बाजारमें भले ही स्टील के बर्तनों का बोलबाला हो पर नेर कांसे के बर्तनों की मांग कम नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में अाज भी कांसे के बर्तन चलन में हैं। हालांकि अब ये बर्तन महंगे हो गए हैं। रामानुज ने बताया जब उन्होंने काम शुरू किया था तब कांसा 10 रुपए किलो था, आज यह 9 सौ रुपए किलो है। इसी तरह 5 रुपए का मोम 250 रुपए किलो हो गया है। इसलिए बर्तनों का लागत मूल्य भी बढ़ा है। चांदीके बर्तन भी बनाए: रामानुजने बताया केंदा, मातिम लाफा के जमींदार उनके पूर्वजों से चांदी के बर्तन बनवाते थे। जमींदार चांदी भेज देते थे इसकी ढ़लाई कर लोटा, गिलास, थाली, फूलदान, कटोरी इत्रदान बनाया जाता था।

बर्तन भेंट करने की परंपरा

शासकीयकार्यक्रमों में आज भी रतनपुर में बने कांसे के बर्तन अतिथियों को भेंट दिए जाते हैं। 3 फरवरी को मेला उद्घाटन के दौरान मंत्री अमर अग्रवाल को विधायक डॉ. रेणु जोगी को भी रतनपुरिहा लोटा भेंट में दिया गया था।

क्या है नेर शिल्प

नेरशिल्प बर्तन बनाने की खास कला है। नेर एक संयुक्त धातु है इसमें जस्ता तांबा मिला होता है। इससे बटुअा, खलबट्‌टा, आरती, घंटा जैसी चीजें बनाई जाती हैं। कांसे मेंे तांबा रांगा मिला होता है इससे थाली, लोटा, गिलास, कटोरी, प्लेट, मंजीरा बनाया जाता है। रामानुज कसेर इन दोनों धातुओं से बर्तन बना रहे हैं।

प्रसिद्ध हैं रतनपुरिहा बर्तन

रतनपुरके इतिहास में कसेर जाति का महत्वपूर्ण स्थान है। कसेरपारा निवासी 75 वर्षीय रामानुज कसेर ‘नेर’ कांसे के बर्तन बनाने में माहिर है। उन्होंने 60 सालों में नेर कांसे के बर्तनों को रतनपुरिहा ब्रांड देकर इसे प्रसिद्धि दिलाई है। जब स्टील के बर्तनों का चलन नहीं था उस जमाने में रतनपुर मेले के माध्यम से रामानुज इनके भाई रामकृष्ण कसेर द्वारा बनाया गया कांसे का हाथी पांव कटोरा, नासकी लोटा, कुंभकर्णी लोटा, मंडलहा लोटा, धतूराफूल गिलास, गुटका गिलास गांवों से लेकर सुदूरवर्ती इलाके तक पहुंच रहे थे। अभी चल रहे रतनपुर मेले में ‘रतनपुरिहा बर्तनों’ की खूब मांग है। यहां तक कि जो दुकानदार बाहर से बने बर्तन लेकर आए हैं वे भी उसे ‘रतनपुरिहा कांसे का बर्तन’ कहकर बेच रहे हैं। आज भी नेर कांसे के बर्तन बाजार में रतनपुरिहा ब्रांड चल रहा है।

15 घरों में थे कारीगर

पहलेकसेरपारा के 15 घरों में नेर कांसे के बर्तन बनाए जाते थे, ये सभी एक ही परिवार से जुड़े थे। ये सभी मोहन साव के नेर शिल्प को आगे बढ़ाने में जुटे थे। वर्तमान में रामानुज कसेर इस परंपरा की अंतिम कड़ी हैं। उनका कहना है कि युवा पीढ़ी जातीय पेशे को छोड़कर दूसरे व्यवसाय को अपना रही है जबकि वे युवाओं को इस कला को सिखाने के लिए तत्पर हैं। उनकी इच्छा है कि रतनपुर की यह खास नेर शिल्प आगे भी घरों की शाेभा बढ़ाए। उनका मानना है कि इस कला को बचाने के लिए शासन को चाहिए कि शिल्पकारों को प्रोत्साहित करे। इसके लिए कार्यशाला आयोजित की जाए। कला गुरुओं को वजीफा दिया जाए।