पलाश से दूर होता है बुढ़ापा

Kanker News - भास्कर न्यूज त्न कांकेर बसंत शुरू होने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों तथा जंगलों में पलाश फूल खिलना शुरू हो जाते...

Mar 07, 2012, 02:06 AM IST
पलाश से दूर होता है बुढ़ापा
भास्कर न्यूज त्न कांकेर
बसंत शुरू होने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों तथा जंगलों में पलाश फूल खिलना शुरू हो जाते हैं। पलाश फूलों से छठा सिंदूरी हो जाती है। पेड़ों पर पलाश फूल होली के कुछ दिन बाद तक रहते हैं जिसके बाद झडऩा शुरू हो जाते हैं। पलाश के फूल ही नहीं इसके पत्ते, डंगाल, फल्ली तथा जड़ तक का बहुत ज्यादा आयुर्वेदिक तथा धार्मिक महत्व है। जिले में प्रचुर मात्रा में होने के बावजूद इसका व्यवसायिक उपयोग नहीं हो पा रहा है। आयुर्वेदिक डॉक्टरों की माने तो होली के लिए रंग बनाने के अलावा इसके फूलों को पीसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है। यही नहीं पलाश की फलियां कृमिनाशक का काम तो करती ही है इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है।
कुछ वर्षों पूर्व तक होली मात्र पलाश फूल से बने प्राकृतिक रंगों से खेली जाती थी। ये प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए भी फायदेमंद होते थे लेकिन बाजार में केमिकल वाले रंग पहुंच चुके हैं तथा अब प्राकृतिक रंगों का उपयोग नहीं के बराबर होता है। पलाश फूलों से पहले कपड़ों को भी रंगा जाता था। पलाश फूल से स्नान करने से ताजगी महसूस होती है। पलाश फूल के पानी से स्नान करने से लू नहीं लगती तथा गर्मी का अहसास नहीं होता। पलाश के फूल को पिसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ जाती है।
पलाश के फूल की उपयोगिता को कई लोग जानते नहीं है और जिसके कारण ये बेशकीमती फूल पेड़ से नीचे गिरकर नष्ट हो जाते हैं। पलाश के पेड़ के पत्ते भी बेहद उपयोगी हैं। पत्तों का उपयोग ग्रामीण दोना पत्तल बनाने के लिए करते हैं। पेड़ का धार्मिक महत्व भी बहुत ज्यादा है। इसकी डंगाल हवन पूजन में काम आती है। पेड़ की जड़ से ग्रामीण सोहई बनाते हैं जिसे दीपवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन के दिन अपने गाय-बैलों को बांधते हैं। पलाश के जड़ से रस्सी बनाकर धान की फसल को भारा बांधने के उपयोग में लाया जाता हैं। पलाश की फल्ली कृमीनाशक तो है ही डॉक्टर तो यह भी मानते हैं की इसकी फल्ली का उपयोग करने से बुढ़ापा भी दूर भागता है।
बेहद उपयोगी है पलाश
ग्राम सिंगारभाठ निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक नारायण सिंह गोरा, राजपुरोहित प्रधुमनलाल शर्मा ने कहा कि पहले लोग पलाश के फूल से ही होली खेलते थे लेकिन अब समय बदलने के साथ केमिकल युक्त रंगों से होली खेलने लगे हंै। केमिकल युक्त रंग का शरीर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता हैं। समाज सेवी मोहन सेनापति ने कहा कि सिविल लाइन के योग विधा साधना केंद्र के साधक प्रतिवर्ष पलाश के फूल से ही होली खेलते हैं। यह शीतलता का प्रतीक है।
इसके उपयोग से चेहरे की चमक बढ़ जाती है। ग्राम गढ़पिछवाड़ी के चमरूराम सलाम, प्रवीण पटेल, रामधन उसेंडी, ग्राम चवड़ के सुरेश साहू, गीतपहर के जैनेंद्र जैन, बिरनपुर के तोरणलाल साहू ने कहा कि अंचल के गांवों में पलाश के पेड़ बहुत ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं। फूल से गांव का सौंदर्य तो बढ़ता है लेकिन अब लोग फूलों का उपयोग नहीं करते। फूल के साथ पेड़ के पत्ते और जड़ भी बहुत ज्यादा उपयोगी हैं। ग्राम मालगांव निवासी शिक्षक भूषण शर्मा ने कहा कि पलाश पेड़ बहुत ज्यादा उपयोगी हैं। इसके फूल के उपयोग से लू को भगाया जा सकता हैं। साथ ही त्वचा संबधी रोग भी पलाश शेषत्न पेज १६
के फूल को लगाने से दूर होते हैं। योग पंतजलि समिति से जुड़ी चंद्रकांती पटेल ने कहा कि टेसू फूल औषधि बनाने के उपयोग में आता हैं। साथ ही इस फूल को कई लोग सहेजकर रखते है क्योंकि इससे कार्तिक और माघ मास में भगवान शिव का पूजन करने की परंपरा हैं। नरहरदेव स्कूल के हिंदी व्याख्याता बीएन गढ़पाले ने कहा कि भारतीय साहित्य में इस फूल की बहुत ज्यादा विशेषताए बताई गई है और पलाश फूल का वर्णन साहित्यकारों ने अपने साहित्य में भी किया हैं।
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