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उम्मीदें बड़ी लेकिन पहल शून्य

6 वर्ष पहले
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इंजन में खराबी, शहडोल पैसेंजर ट्रेन घंटों लेट

26फरवरी को पेश होने वाले रेल बजट को लेकर सरगुजा को ढेरों उम्मीदें हैं लेकिन कोई पहल हो रही है और ही तेजी से मांग उठ रही है। रेल मंत्री द्वारा बजट के मद्देनजर हाल ही में बुलाई गई बैठक में सांसद नदारद थे। जिले में इस मुहिम में लगे लोग चिट्‌ठी लिखने तक ही सिमट गए हैं। संसद में जिले की आवाज को पहंुचाने की बड़ी जिम्मेदारी सांसद पर है लेकिन पंचायत चुनाव के कारण वे जिले में ही जमे हुए हैं। उनका कहना है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के कुछ महीने बाद ही पार्टी के दस सांसदों के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात कर जिले की मांग पर ध्यान दिला चुका हूं। 16 फरवरी के बाद इसी सिलसिले में दिल्ली जाने का कार्यक्रम है। जिले में अंबिकापुर-बरवाडीह रेल लाइन सहित कई मांगे हैं। बरवाडीह रेल लाइन दो साल से स्वीकृत है लेकिन रेलवे बोर्ड से मंजूरी नहीं मिलने के कारण विस्तार रुका हुआ है। अन्य रेल लाइनों का मामला भी सर्वे तक सिमटा हुआ है। अंबिकापुर से दिल्ली तक सीधी ट्रेन और रायपुर तक इंटरसिटी ट्रेन की मांग है।

रेल बजट में सरगुजा को इन उम्मीदों के पूरी होने की आस है क्योंकि छत्तीसगढ़ के साथ केंद्र में भी भाजपा की सरकार है लेकिन लेकिन मामले में जिस तरह से नेतृत्वकर्ता खामोश हैं उससे निराशा के बादल दिखाए दे रहे हैं। शहर में चर्चा शुरू हो गई है कि मेडिकल कालेज के मामले में जिस तरह से निराशा हाथ लगी वही हाल रेल के मामले में होने वाला है। रेल सुविधाओं के मामले में खनिज संपदाओं के प्रचुर भंडार के बाद भी आदिवासी बहुल यह अंचल अब तक पिछड़ा हुआ है। रेल सुविधाओं को लेकर मांग होती रही है लेकिन एकजुटता नहीं दिखाई दी। दलगत भावना के कारण मुद्दे कमजोर होते रहे। सरगुजा में रेल सुविधाओं के विस्तार की आवश्यकता है। रायपुर-बिलासपुर को छोड दें तो जिले और जिले से बाहर के लिए बसें ही सहारा हैं। अंबिकापुर से रायपुर, शहडोल, जबलपुर और मनेंद्रगढ़ के लिए ट्रेन चलती है जिनमें भीड़ काफी रहती है। लोगों की परेशानियों को देखते हुए रायपुर तक इंटरसिटी ट्रेन की मांग कई साल से हो रही है। दिल्ली के लिए अब तक यह अंचल सीधे रेल सुविधा से नहीं जुड़ पाया है। जबलपुर ट्रेन सप्ताह में तीन दिन है, जिसे नियमित करने की मांग है।

जिले में रेल सुविधाओं को लेकर मांग उठती रही है लेकिन आवाज दिल्ली तक नहीं पहंुच पाती। यहां के सांसदों ने भी इसके लिए कभी ठोस पहल नहीं की। ज्यादातर सांसद निष्क्रय रहे। कई सांसदों की हालत तो यह रही कि चुनाव जीतने के बाद पांच साल तक लोग उन्हंे खोजते रहे। इस बार लोकसभा चुनाव में रेल सुविधाओं का विस्तार प्रमुख मुद्दा था। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने सत्ता में आने के बाद इस पर ध्यान देने की बात कही थी लेकिन एक साल बीत गए, कोई पहल नहीं दिखाई। हालत का पता तो इसी से लगाया जा सकता है कि रेल मंत्री द्वारा हाल ही में बुलाई गई सांसदों की बैठक में सरगुजा ही नहीं प्रदेश के सांसद नदारद थे। इधर बजट पेश होने में मात्र 20 दिन बचे हैं लेकिन उसके बाद भी कोई सुगबुगाहट नहीं है। केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार है और बड़ी जिम्मेदारी पार्टी की बनती है। सांसद कमलभान सिंह पहली बार सांसद बने हैं जबकि िपछले दोनों कार्यकाल में भी भाजपा के सांसद थे। सांसद कमलभान सिंह ने इस संबंध में पूछे जाने पर बताया कि पंचायत चुनाव के कारण व्यस्तता रही। 16 फरवरी को जिला पंचायत के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए चुनाव होना है और इसके बाद वे रेल के लिए लगेंगे। दिल्ली जाएंगे, रेल मंत्री से मिलेंगे और बात नहीं बनी तो प्रधानमंत्री से भी मिलेंगे।

जनप्रतिनिधियों को करनी चाहिए पहल

सरगुजारेल संघर्ष समिति जिले में रेल सुविधाओं को लेकर आवाज उठाती रही है। समिति के संयोजक वेद प्रकाश अग्रवाल ने कहा कि इसमें जनप्रतिनिधियों को आगे आकर पहल करना चाहिए जिसकी कमी खलती रही है। भाजपा इस अंचल में रेल सुविधाओं के विस्तार नहीं होने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराती रही है लेकिन अब भाजपा बहानेबाजी नहीं कर सकती। छत्तीसगढ़ के साथ केंद्र में भाजपा की सरकार है। सरगुजा में भी भाजपा के सांसद हैं। जनप्रतिनिधियों को रेल सुविधाओं के लिए दिल्ली तक आवाज उठानी चाहिए। रेल संघर्ष समिति रेल सुविधाओं के लिए आवाज उठाती रही है और यह सिलसिला जारी रहेगा।

सर्वे पर ही रुक जाती है गाड़ी

अंबिकापुरसे बरवाडीह रेल लाइन का विस्तार, अंबिकापुर से झारसुगड़ा और रेणुकूट लाइन की मांग है लेकिन बरवाडीह लाइन को छोड़ दें तो सभी लाइनों का मामला सर्वे तक सिमटा हुआ है। बरवाडीह रेल लाइन अंग्रेजों के जमाने की परियोजना है और दो साल पूर्व यूपीए सरकार के कार्यकाल में इसकी सवीकृित मिली है लेकिन विस्तार शुरू नहीं हो रहा है। अधिकारियों द्वारा रेल संघर्ष समिति से जुड़े शहर के लोगो को जानकारी दी गई है कि बरवाडीह लाइन के मंजूरी के लिए रेलवे बोर्ड को पत्र लिखा गया है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि इतनी महत्वपूर्ण परियोजना का काम केवल मंजूरी के इंतजार में लटका हुआ। इस लाइन के शुरू होने के बाद यात्रि सुविधाओं के साथ व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। मुंबई और कोलकत्ता की दूरी करीब चार सौ किलोमीटर इस लाइन से कम हो जाएगी लेकिन रेलवे का इस ओर ध्यान नहीं है। नेतृत्वकर्ता भी इस उम्मीद में बैठे हैं कि स्वीकृति मिल गई है तो काम शुरू होगा ही। नेतृत्वकर्ताओं की इसी तरह की निष्क्रियता के कारण रेल सुविधाओं के मामले में उपेक्षित है।