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जनसहयोग से गुरुकुल शिक्षा ने दिखाई राह

6 वर्ष पहले
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दो बालिकाओं का चयन अंतराष्ट्रीय देव संस्कृति विद्यालय के लिए

अंबिकापुर/बतौली|ब्लाकमुख्यालय बतौली से चार किलोमीटर दूर है ग्राम भटको। जंगल, पहाड़ के बीच बसे इस क्षेत्र में जहां सूर्य की रोशनी भी ठीक से नहीं पहंुच पाती ऐसे चुनौती भरे इलाके में गुरूकुल शिक्षा पद्धति से प्राचीन संस्कृति को सहेजने के साथ बालिकाओं को स्वावलंबी बनाया जा रहा है। सारा प्रयास उसी तरह से हो रहा है जिस प्रकार प्राचीन समय में गुरूकुल की शिक्षा व्यवस्था थी। करीब डेढ़ दशक से जनसहयोग से चल रहा प्रयास अब अंतराष्ट्रीय देव संस्कृति विद्यालय में जगह बनाने जा रहा है। हरिद्वार में संचालित इस विद्यालय में यहां की दो बालिकाओं का इंटर्नशिप के लिए चयन हुआ है जिनका सपना यहां से निकलकर अपनी संस्कृति की रक्षा नारी शक्ति को मुकाम देना है।

गुरूकुल जैसी शिक्षा व्यवस्था अब भले ही सुनने में अटपटी लगे लेकिन ग्राम भटको में यह चरितार्थ हो रहा है। एक कमरे से शुरू हुए सफर ने अब देव संस्कृति विद्यालय का रुप ले लिया है। यहां सरगुजा के अलावा पड़ोसी राज्यों की 85 बालिकाएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। हायर सेकेंडरी तक यह विद्यालय है। यहां गुरूकुल पद्धति की तरह शिक्षा के अलावा चिकित्सा व्यवस्था, बागवानी, गौशाला है। वृद्धों के लिए एक आश्रम भी है। सुबह से लेकर शाम तक की गतिविधियों से चहल-पहल रहती है। बालिकाओं का हौसला देखते ही बनता है। पढ़ाई के अलावा हर काम के लिए समय तय है। सुबह योग की शिक्षा तो दोपहर में पढ़ाई के बाद संगीत की क्लास होती है। यहीं से निकलकर दो बालिकाएं अंतराष्ट्रीय देव संस्कृति विद्यालय पहंुची हैं। उनका यहां तक पहंुचना भी प्रेरणास्पद है। देश के बड़े-बड़े शहरों के अलावा विदेशी प्रतिभाओं के बीच बािलकांए खुद को साबित कर जगह पाने में सफल रहीं। बालिकाओं का यहां पहंुचना यहां की अन्य बालिकाओं के लिए उदाहरण बन गया है और हर बालिका खुद को वहां देखना चाहती है।

भोजनऔर मानदेय का प्रबंध जनसहयोग से: विद्यालयको इस मुकाम तक पहंुचने में बतौली क्षेत्र के लोगों की अहम भूमिका रही है। क्षेत्र के लोग चंदा कर राशि एकत्र करते हैं जिससे विद्यालय चल रहा है। इससे बालिकाओं का भोजन और शिक्षकों को मानदेय दिया जाता है। स्थानीय बालिकाएं जो सक्षम हैं वे घर से चावल ले आती हैं शिक्षक समय दान के रुप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जिले के अलावा बिहार तथा अन्य क्षेत्रों से यहां शिक्षक हैं। कुछ लोग बिना मानदेय के सेवा दे रहे हैं। गौशाला के लिए किसान अपने अनुपयोगी मवेशियों को यहां छोड़ देते हैं। गोबर और गौ मूत्र से अर्क, बटी के अलावा, कीटनाशक, काला दंत मंजन, जैविक खाद, अगरबत्ती बनाई जाती है जिसका उपयोग आश्रम में किया जाता है।

आश्रम के लिए कर दिया खुद को समर्पित

अाश्रमखड़ा करने का श्रेय बतौली निवासी अरूण कुमार गुप्ता को जाता है। गायत्री परिवार से जुड़े श्री गुप्ता ने अपनी दो एकड़ जमीन संस्था को दान में दी है जिस पर यह विद्यालय खड़ा हुआ। आश्रम की देखरेख की जिम्मेदारी हरिप्रसाद यादव की है जो समयदानी सेवक के रूप में अपने को आश्रम के प्रति समर्पित कर चुके हैं। उनकी प|ी भी इस इस काम में साथ निभा रही हैं। आश्रम से जुड़े लोगों द्वारा जनजागरण, व्यसन मुक्ति, बाल संस्कार जैसे कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं। संस्था से जुड़े लोग पूरे ब्लाक में हैं और हर कोई अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहा है। ब्लाक के हर गांव में सप्ताह में एक दिन बाल संस्कार शाला लगाया जाता है जिसमें जीवन के संस्कार, मानवता के गुण और योग की शिक्षा दी जाती है।

गुरुकुल विद्यालय की छात्राएं शिक्षक