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चंदन की खुशबू बिखेरने की कोशिश कर रही महिला कृषक

4 वर्ष पहले
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अब तक लोग नीलगिरी और ऐसे ही विनाशकारी पौधे तात्कालिक लाभ के लिए लगाते आ रहे हैं लेकिन इसकी जगह यदि चंदन की पौधे लगाए जाएं तो इससे कई सौ गुना ज्यादा लाभ मिल सकता है। शहर से 10 किमी दूर गारावंड खुर्द गांव की महिला कृषक प्रभाती भारत ने इस बात को समझा और जैविक खेती को अपनाकर अपने गांव को समृद्ध बनाने की ठान ली है।

इसके लिए उन्होंने दूसरों के खेतों में काम करने वाली महिलाओं का ग्रुप बनाया और इन्हें जैविक खेती के लिए प्रशिक्षित करना शुरु कर दिया। आज बस्तर में यह अकेला गांव है जहां सबसे ज्यादा जैविक खेती होती है। यहां के किसान हाईब्रिड बीज का उपयोग बिल्कुल नहीं करते ।

इतना ही नहीं वे चंदन के व्यवसायिक रोपण पर भी जोर दे रहीं हैं। दस साल पहले ओडिशा से चंदन के 15 पौधे लाकर इसे प्रायोगिक तौर पर अपने फार्म हाउस में लगाया। देख-रेख और सही रखरखाव के बाद पौधे तेजी से बढ़े और अब ये 15 से 20 फीट तक ऊंचे हो गए हैं। इनके तनों की गोलाई भी करीब 2 फीट की हो गई है। इनके ही प्रयास से गारावंड खुर्द के साथ ही बालाजी मंदिर, ग्राम पंचायत नेंगीगुड़ा में कृषक मोहन सेठिया के यहां तथा शिव मंदिर परिसर में ये पौधे लहलहा रहे हैं।

बस्तर की आबो-हवा चंदन की पैदावार के लिए उपयुक्त : शासकीय उद्यानिकी कॉलेज के वैज्ञानिक केपी सिंह ने बताया कि कर्नाटक और तामिलनाडू में बड़े पैमाने पर चंदन के पेड़ लगाए जाते हैं। इसके अलावा मध्यप्रदेश के मंदसौर के आसपास तथा मालवा अंचल में बड़े पैमाने पर सरकारी जमीन पर चंदन लगाए गए हैं। बस्तर की आबो-हवा चंदन की पैदावार के अनुकूल है। यहां इसकी अच्छी संभावना है। इसके व्यवसायिक उत्पादन में सबसे बड़ी समस्या चोरों से होती है, 6-7 साल पुराने पेड़ भी वे काट ले जाते हैं। चंदन का पेड़ कम से कम 34 साल बाद उपयोगी होता है, जमीन से 2 फीट नीचे जड़ तक और तने की ओर 2 फीट ऊपर के हिस्से में ऊपरी आवरण हटाने के बाद हर्ट-वुड मिलता है जिसका उपयोग तेल निकालने के लिए किया जाता है। घिसने में उपयोग होता है।

ससुर से मिली प्रेरणा, पति ने भी आगे बढ़ाया
पति विजय भारत भी वनौषधीय पौधों की जानकारी रखते हैं। वनौषधीय पौधों को लेकर रूचि इन्हें विरासत में मिली है। प्रभाती के ससुर विशाल भारत वन विभाग में रेंजर थे। वे औषधीय पौधों के जानकार थे, पौधों की प्रजाति से लेकर इसका उपयोग के बारे में लोग दूर-दूर से उनसे पूछने आते थे। तोकापाल के निकट आरापुर के शिव मंदिर में चंदन का रोपण करवाया था। इसकी संख्या 110 तक पहुंच गई थी। कुछ पेड़ आज भी खड़े हैं, लेकिन अधिकांश को लोगों ने पैसों के लालच में काट दिया है।

34 साल लगते हैं पौधे तैयार करने में
खेतों के मेड़ पर इसका रोपण हो सकता है। इसे तैयार होने में 34 साल का वक्त लग जाता है, तब तक शेष जमीन पर आसानी से खेती की जा सकती है। इस समय बाजार में चंदन की लकड़ी 6 हजार रुपए प्रति किलो की दर पर मिलती है और इसका तेल ढाई लाख रुपए प्रति लीटर के भाव पर मिलता है। प्रभाती ने औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से प्रशिक्षण प्राप्त कर ग्रामीण वनस्पति विशेषज्ञ का कोर्स पूरा किया है। अब वे विलुप्त हो रही प्रजातियों पर काम कर रहीं हैं।

ग्राम नेंगीगुड़ा में लगाए चंदन के पेड़ के साथ खड़ा किसान।

गारावंडखुर्द में महिला कृषक प्रभाती भारत चंदन पेड़ के साथ।

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