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देवी का एक खेत ऐसा भी जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित
एक्सक्लूसिव
भास्कर
कराट मुंडा के पूर्वी छोर पर करीब आधे एकड़ हिस्से में स्थित छोटे से जंगल की टहनी तक काटना प्रतिबंधित है। गांव के लोग तो पेड़ काटने की हिम्मत नहीं करते, लेकिन जाने-अनजाने गलती करने वाले बाहरी मजदूरों से भी ग्रामीण भारी-भरकम जुर्माना वसूलते हैं। कराट मुंंडा में फसल कटाई के बाद मिसाई इसी जंगल में होती है, गांव के बीज त्यौहार के वक्त सामूहिक आखेट में मिले वन्य जीव भी यहीं पर देवी को समर्पित किए जाते हैं।
कब से प्रचलित है परंपरा
ग्रांवके पूर्व उप सरपंच बुजुर्ग पदमसिंह की मानें तो उक्त खेत पूर्व में गांव के एक परिवार के कब्जे में था। सन् 1950 के आस-पास फसल कटाई के दौरान हुई कहासुनी में उत्तेजित हुए पुरूष सदस्य ने अपनी गर्भवती प|ी को हंसिए से मार डाला था। घटना के बाद परिवार गांव छोड़कर चला गया। 2-3 परिवारों ने खेत पर फसल लेने की कोशिश की, लेकिन खेत को अभिशप्त माना जाने लगा। अंतत: ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से फसल लेने का निर्णय लिया, जो अब तक चला रहा है। एक मोहल्ले के लोग हल जुताई करते हैं, तो दूसरे मोहल्ले पर धान की बोनी और तीसरे पर फसल कटाई का जिम्मा सौंप दिया जाता है। खास बात यह है कि सीजन में जब तक कराट मुंडा में बोनी नहीं हो जाती, इस मुहाने के किसी भी दूसरे खेत में बोनी करने की मनाही होती है। बोनी के दिन सबसे पहले गांव का गायता(माटी पुजारी) पूजा कर देवी से अनुमति मांगता है और 50-55 हल-बैल के साथ ग्रामीण खेत में उतरते हैं।
शैलेंद्र ठाकुर | दंतेवाड़ा
दंतेवाड़ासे करीब 10 किमी दूर पंडेवार में एक खेत ऐसा भी है, जिसे ग्रामीण दैवीय तो मानते हैं, लेकिन महिलाओं के खेत के आस-पास भी फटकने पर पाबंदी है।
बरवा डोकरी देवी के इस खेत की तरफ गांव की महिलाएं रूख नहीं करतीं, लेकिन बाहर से आने वाली महिलाएं अगर जाने-अनजाने भी खेत में कदम रखती हैं, तो ग्रामीण जुर्माने के तौर पर मुर्गे, बकरे, सूअर और अनाज पैसे वसूल लेते हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि कराट मुंडा खेत पर महिला की परछाई भी पड़ गई तो दैवीय आपदा गांव पर कहर बनकर टूटेगी। गर्भवती महिलाओं के गर्भपात की आशंका भी होती है। खेत की जुताई से लेकर फसल कटाई तक का काम गांव के पुरूष करते हैं। पुरूष ही कटाई लिए हंसिया थामते हैं, जबकि आम तौर पर इलाके में फसल कटाई का काम महिलाओं के जिम्मे होता है। कटाई के बाद धान की