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पत्थर तो बहुत मिलते हैं, लेकिन प्रतिमा गढ़ने की मिट्टी नहीं

7 वर्ष पहले
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सैंड स्टोन ग्रेनाइट से बनी प्राचीन मूर्तियां

पहले से करना पड़ता है जुगाड़

दक्षिणबस्तर में फसल कटाई के बाद पैरा सहेजकर रखने का चलन कम होने से मूर्तिकारों को दिक्कत होती है। जयंतो के मुताबिक हर साल फसल कटाई के बाद आकर पैरा रखवाना पड़ता है। फ्रेम के लिए लकड़ी आैर दीगर सामग्री से लेकर सभी चीजों की कीमत चुकानी पड़ती है।

जिले में मिलने वाली पुरातात्विक महत्व की अधिकांश मूर्तियां आम तौर सैंड स्टोन या ग्रेनाइट की हैं। कुछ इलाकों में नर्म पत्थर (स्थानीय बोली में खड़ी पखना) से भी मूर्तियां बनाई जाती हैं।

श्रृंगारभी कोलकाता का

दुर्गोत्सवके लिए तैयार होने वाली देवी प्रतिमाओं के लिए श्रृंगार भी कोलकाता से मंगाया जाता है। साड़ी, मुकुट, आभूषण जैसी चीजें स्थानीय मार्केट में भी उपलब्ध रहती हैं, लेकिन ज्यादा संख्या में मूर्ति बनाने वालों को कोलकाता से लाना सस्ता पड़ता है।

वाटरकलर का इस्तेमाल

पर्यावरणसंबंधी आपत्तियों के चलते अब मूर्तिकार सिंथेटिक इनामेल पेंट की बजाय वाटर कलर का इस्तेमाल करने लगे हैं। सिंथेटिक इनामेल जैसी चमक लाने के लिए नई तकनीक अपनाई जा रही है।

11 वीं से 13 वीं सदी के प्राचीन मूर्तियों स्थापत्य कला के लिए मशहूर दक्षिण बस्तर में मूर्ति तराशने के लिए पत्थर तो बहुत मिलते हैं, लेकिन देवी प्रतिमा गढ़ने के लिए चिकनी मिट्टी नहीं मिलती।

भास्करन्यूज . दंतेवाड़ा

मूर्तिकार हर साल कोलकाता से मिट्टी मंगाते हैं। नवरात्रि के लिए देवी दुर्गा की प्रतिमा तैयार कर रहे मूर्तिकारों को मानें तो ट्रेन से मिट्टी बोरियों में भर कर लायी जाती है।

पड़ोसी राज्य मलकानगिरी से आकर मूर्तियां गढ़ रहे जयंतो मंडल की मानें तो आस-पास मिलने वाली मिट्टी से मूर्ति तैयार तो हो जाती है, लेकिन सूखने पर फटने लगती है।

इसके चलते पहले मूर्ति स्थानीय मिट्टी से तैयार की जाती है, उसके ऊपर कोलकाता से मंगाई खास किस्म की काली मिट्टी का लेप लगाकर फिनिशिंग करना पड़ता है। गंगा नदी किनारे जमा होने वाले गाद की मिट्टी से मूर्तियों की फिनिशिंग अच्छी होती है।