पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • भाजपा की बैठकों में उठने लगे विरोध के स्वर

भाजपा की बैठकों में उठने लगे विरोध के स्वर

6 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
{ जिलेवार बैठकों में होगी समीक्षा निगम और पंचायत चुनावों में हार की।

{ बड़े नेताओं के सामने फूटेगा कार्यकर्ताओं का आक्रोश, तय होंगी जिम्मेदारियां।

भास्करन्यूज | जगदलपुर

लोकसभाको छोड़ दें तो विधानसभा, निगम और आखिरी में पंचायत चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका लगा है। पार्षद ज्यादा जीतने के बाद भी महापौर नहीं जीते। जिला पंचायत में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने की राह आसान है।

दरअसल भाजपा की यह हालत कांग्रेस से कम उनके खुद के नेताओं के रवैए से ज्यादा हुई है। भीतरघात तो दूर कुछ नेता इन चुनावों में एक दूसरे को निपटाते दिखे। एक-दो पार्षद तो किसी तरह अपनी नैया पार कराने में कामयाब हो गए, वहीं एक-दो को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा। अब इस तरह के नेता अपनी पीड़ा को दबाना नहीं चाहते। यही वजह है कि रविवार को पार्टी कार्यालय में सदस्यता अभियान की बैठक को दौरान कार्यकर्ताओं का आक्रोश फूट पड़ा।

हालांकि उस समय तो उन्हें यह समझा दिया गया कि राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री खुद बैठक लेकर समीक्षा करेंगे लेकिन यह तय माना जा रहा है कि अब सत्ता-संगठन के बड़े कोई भी नेता बैठक लें, कार्यकर्ता अपना भड़ास निकालने में पीछे नहीं रहेंगे। विरोध के स्वर तो पिछले कुछ दिनों से उठ रहे हैं, लेकिन ऐसे लोगों को पार्टी का उचित मंच नहीं मिल रहा था।

नगरीय निकाय चुनाव के बाद सभी छोटे-बड़े नेता त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में व्यस्त हो गए थे। उसी समय यह माना जा रहा था कि यदि गांव की सरकार में भाजपा की हिस्सेदारी आसानी से बन गई तो निगम चुनाव की हार को आसानी से भुला दिया जाएगा। ऐसा हो नहीं पाया। पंचायतों में हालत पहले से ज्यादा पतली हो गई।

सदस्यों की फौज, फिर भी हार रहे चुनाव

भाजपानेताओं ने सदस्यता अभियान पिछले काफी दिनों से चला रखा है। जिसमें सांसद से लेकर विधायक, मंत्री से लेकर तमाम पदाधिकारी जुटे हुए। अहम यह है कि हर कोई ज्यादा से ज्यादा सदस्य बनाने का दावा कर रह है। वहीं हारे हुए प्रत्याशी इन दावों की पोल खोल रहे हैं। उनका कहना भी ठीक है कि यदि भाजपा के पास कार्यकर्ताओं की फौज है तो हर चुनाव में एक के बाद एक हार का मुंह क्यों देखना पड़ रहा है। इसका खुलासा निगम चुनाव में हो चुका है। आधा दर्जन से ज्यादा वार्ड ऐसी थी जहां भाजपा के पार्षदों को अच्छे खासे वोट मिले लेकिन महापौर प्रत्याशी वहां पूरी तरह से पिछड़े रहे। इस तरह कई जगह एक दूसरे को निपटाने का खुला खेल चला जो अब आक्रोश बन गया है। राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री तक बस्तर जिला में हुए दोनों चुनावों की रिपोर्ट पहुंच चुकी है। अब कार्रवाई कितनों पर होती है यह समीक्षा बैठकों के बाद पता चलेगा।

सियासत