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बीते सात दिनों में 16 आदिवासियों को चाकू से गोद-गोदकर मारा

6 वर्ष पहले
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बस्तर जो आदिवासियों का था, आज उनको छोड़ सबका है...
बस्तर से टाटा गया, गूंज उठी। एस्सार गया, लोग चौंके। लेकिन अबूझमाड़ के जंगलों से 20-22 लोगों की चीखें निकल गईं, न कोई गूंज हुई और न ही कोई चौंका। ये बस्तर की हकीकत है। वहां नक्सलियों और पुलिस के बीच पिसने वाला आम आदिवासी ही है। नक्सलियों का साथ दें तो आदिवासी पुलिस का शिकार और पुलिस का साथ दें, तो नक्सलियों का शिकार। जे़हन में एक लम्हे के लिए सोचिए- आप जिस घर में रहते हैं, वहां से रातोंरात आपको परिवार समेत किसी दूसरी जगह जाने का फरमान सुना दिया जाए। क्या होगा? सिहर उठेंगे। ये बस्तर के जंगलों में रोज होता है। कभी पुलिस, तो कभी नक्सली गांव के गांव खाली कराते हैं। बस्तर जो आदिवासियों का था, जंगल जो आदिवासियों का था, आज वो उनको छोड़कर सबका हो गया है। नक्सलियों का, पुलिस का, फोर्स का, राज्य का, केंद्र का, मीडिया का, लेखकों का, विचारकों का, बुद्धिजीवियों का। सारे लोग अपने अपने लिए भुना रहे हैं बस्तर को, लेकिन इन सबमें आदिवासी ही नदारद है। दहशत के जंगल में घुट-पिट रहे लोगों की ज़ुबानें बंद हैं। शेष|पेज 4





किससे कहें, क्या कहें और क्यों कहें? आदिवासी इन्हीं सवालों में बचपन गुजारतें हैं और जवाब की तलाश में या ख़ामोशी ओढ़ लेते हैं या फिर मौत तक पहुंच जाते हैं। कुल मिलाकर उनके लिए सवाल, सवाल ही रह जाता है। यानी यहां की जिंदगी सिर्फ सवालों की है, जवाब है नहीं। ये बात बिल्कुल सही है कि हमारे जवान वहां तैनात हैं, इसी कारण नक्सली खुद भी दहशत में हैं, लेकिन दहशत में होने और जान जाने में जमीन-आसमान का फर्क है। जान तो आदिवासियों की ही जा रही है न? सबसे बड़ी बात, इन मौतों पर सब खामोश है। इतनी मौतों से कोई सिहरता नहीं है। मौतें रुकी नहीं तो हमारा बस्तर सिर्फ किताबों के पन्नों में ही रह जाएगा।

नक्सलियों की मौत का बदला!
सिक्युरिटी फोर्सेस ने पिछले कुछ दिनों में लगातार नक्सलियोंं के खिलाफ अभियान चलाया है। इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। इसी का बदला लेने नक्सलियों ने ग्रामीणों को मारा। मंगलवार को भी पांच नक्सलियों को मारा था।

गश्त तेज की जाएगी: मीणा
नारायणपुर एसपी अभिषेक मीणा ने बताया कि लोगों की हत्या करने की खबर मिली है। गांव वालों की सिक्युरिटी के लिए पुलिस की गश्त अब उन इलाकों में तेज की जाएगी।

मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है।

बता दें कि ये सभी गांव माओवादियों के गढ़ माने जाने वाले इलाके में हैं।

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नक्सलियों ने कुतुम और आस-पास के 6 गांवों में ये हत्याएं की हैं।

क्यों नाराज थे नक्सली गांव वालों से
दरअसल ये वो इलाका है, जहां पुलिस कभी भी नहीं पहुंच पाई है। लेकिन पिछले एक साल में दो बार पुलिस ने यहां सर्च ऑपरेशन चलाया।

बताया जा रहा है कि इसी बात से नक्सली नाराज थे।

नक्सलियों ने गांव वालों को धमकी दी थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखाने पर अंजाम भुगतना होगा।

सभी पर मुखबिरी का आरोप