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बेकार गई दुग्गड़ की शहादत, अभी भी समस्या जस की तस
24सितंबर 1983 का वह दिन आज भी जब नागरिकों के जेहन में आता है तो रूह कांप उठती है। पानी और बिजली की मांग करने वालों पर गोली बरसा दी गई थी। नगर में खून की होली खेली गई। गोलीकांड से थाना परिसर लहू के रंग से सराबोर हो गया था। इस घटना में जहां एक युवक को अपनी जान गवानी पड़ी, वहीं कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। घायलों में से तीन आज भी अपाहिज की जिंदगी गुजार रहे हैं।
पुलिस ने बर्बरतापूर्वक कार्रवाई करने के बाद 46 लोगों को अपराधी बनाकर प्रकरण दर्ज किया था। उस हिंसक कार्रवाई के विरोध में तीन दशक बाद भी 24 सितंबर को नगर में काला दिवस के रूप में मनाया जाता है। जिन मांगों को लेकर हुए आंदोलन में नगर के युवक राजकरण दुग्गड़ ने जान गंवाई उन समस्याओं का अब तक निराकरण नहीं हो पाने का नगरवासियों को मलाल है। समस्याएं जस की तस हैं। इसका स्थायी निराकरण करने आज भी पालिका प्रशासन नाकाम साबित हो रही है। नगर में 21 वार्ड हैं लेकिन आए दिन पानी बिजली की समस्या सुनने को मिलती है।
पंप हाउस में खराबी तो कभी अन्य किसी कारण से शहर में पानी सप्लाई नहीं हो पाती। अगर पानी आता भी है तो कई मोहल्लों में पाइप लाइन फूटने और नाली के बीच से गुजरे होने के कारण गंदा पानी आता है। बिजली की समस्या भी बरकरार है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब 8 से 10 बार बिजली गुल होती हो। इस सब समस्याओं को देखने वाला शहर में प्रशासन नाम की कोई चीज ही नहीं है। शहर के लोगों का कहना है कि शहीद राजकरण दुग्गड़ की शहादत बेकार गई। नगर के इस लाल की शहादत को नगरवासी भी समय के साथ भूलते जा रहे हैं। शहादत के नाम पर महज दिखावा ही किया जाता है। राजकरण दुग्गड़ के नाम पर नगर में शहीद राजकरण दुग्गड़ स्मृति संस्थान खेल विकास संस्थान बनाया गया है, जो प्रतिवर्ष 24 सितंबर को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनको याद करती है। जिसमें नगर के बड़े-बड़े जनप्रतिनिधि ही नहीं पहुंचते। शहादत की केवल औपचारिकता ही निभा दी जाती है।
नगर में एक उद्यान को उनके नाम पर रखकर एक प्रतिमा स्थापित कर दी गई है, लेकिन इसकी दुर्दशा किसी को नहीं दिखती। पालिका प्रशासन की अनदेखी के कारण यह असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है।
अब उस गार्डन को राष्ट्रीय राजमार्ग में होने के कारण तोड़ना पड़ रहा है।
वर्ष 1983 में नगरवासी बिजली पानी की समस्या त्रस्त थे। लोगों द्वारा नगरपालिका क