पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • सौ साल पुराना सिंचाई प्रोजेक्ट अब भी अधूरा

सौ साल पुराना सिंचाई प्रोजेक्ट अब भी अधूरा

5 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
रुद्री बैराज निर्माण के साथ सन् 1915 में अस्तित्व में आई महानदी सिंचाई परियोजना के सौ साल पूरे हो चुके हैं। इतने सालों में इस नदी पर कुछ और बांध बनने के साथ सिंचाई क्षमता 33,033 हेक्टेयर से बढ़कर करीब पौने तीन लाख हेक्टेयर तक पहुंच चुकी है, इसके बावजूद अंचल का बड़ा इलाका अब भी सिंचाई सुविधा से वंचित है, क्योंकि यह परियोजना पैरी हाई डैम के बिना अब भी अधूरी है।

अंचल में हमेशा मंडराती अकाल की काली छाया को देखते हुए ब्रिटिश शासन काल में तत्कालीन अफसरों ने महानदी पर वृहद सिंचाई परियोजना की परिकल्पना की थी। इसके बाद सन् 1915 में ग्राम रुद्री में महानदी पर बैराज बनाया गया, जिससे 33 हजार 33 हेक्टेयर रकबे को सिंचाई सुविधा मिली। परियोजना को आगे बढ़ाते हुए सन् 1923 में अंग्रेजों ने ही मुरुमसिल्ली बांध बनाया, जिसका पानी आने पर रुद्री बैराज की सिंचाई क्षमता बढ़कर 85 हजार हेक्टेयर हो गई।

परियोजना को लेकर अंग्रेज अफसरों ने आगे और विस्तार की परिकल्पना की थी, पर उनका शासनकाल खत्म हो गया, तब आजाद भारत के अफसरों ने उनकी लाईन पर ही इस काम को आगे बढ़ाया और 1962 में महानदी पर ही दुधावा बांध बनकर तैयार हुआ, जिससे परियोजना की सिंचाई क्षमता बढ़कर 1 लाख 41 हजार हेक्टेयर हो गई। अंत में इस परियोजना का मुख्य बांध ग्राम गंगरेल में सन् 1978 में रविशंकर जलाशय बनकर तैयार हुआ, जिससे कुल सिंचाई क्षमता बढ़कर 2 लाख 49,500 हेक्टेयर हो गई। इसके अलावा सिहावा क्षेत्र में बने सोंढूर बांध को भी इस परियोजना से जोड़ दिया गया, जिससे 26,210 हेक्टेयर की अतिरिक्त सिंचाई सुविधा मिली।

स्वीकृति का इंतजार
शासन से स्वीकृति का इंतजार पैरी हाई डैम प्रोजेक्ट काफी पुराना है, जिसे शासन से स्वीकृति मिलने का इंतजार है। इस मामले में फिलहाल पत्र व्यवहार चल रहा है। संतोष ताम्रकार, ईई जल संसाधन संभाग, रूद्री

सबने साधी चुप्पी
पैरी हाई डैम का काम क्यों आगे नहीं बढ़ पा रहा है, इस सवाल का जवाब कोई जिम्मेदार अफसर देने को तैयार नहीं है। अभी के ज्यादातर अफसरों को तो सालों पुरानी इस परियोजना के बारे में खास जानकारी भी नहीं हैं। जो जानकार हैं, उनका सिर्फ इतना कहना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति रहती, तो यह डैम कब का बन चुका होता।

बहुउद्देशीय स्वरूप ले चुकी है परियोजना
सिंचाई के मूल उद्देश्य से सौ साल पहले शुरू हुई महानदी परियोजना समय-समय पर हुए विस्तार के साथ अब बहुउद्देशीय स्वरूप ले चुकी है। परियोजना के मुख्य बांध गंगरेल से सिंचाई के अलावा हजारों गांवों की निस्तारी, रायपुर व धमतरी निगमवासियों के लिए पेयजल आपूर्ति, भिलाई स्टील प्लांट को पानी आपूर्ति के साथ ही बिजली उत्पादन के लिए भी पानी दिया जा रहा है।

अब भी है अधूरी है महानदी जलाशय परियोजना
महानदी जलाशय परियोजना धमतरी के साथ ही रायपुर, दुर्ग, बालोद, बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के खेतों के लिए जीवन रेखा बन चुकी है, इसके बावजूद यह परियोजना अब भी अधूरी है। इसकी पूर्णता की कल्पना गरियाबंद में प्रस्तावित पैरी हाई डैम से की गई थी, जिससे निकलने वाली नहर को रूद्री बैराज से जोड़ा जाना है। इस नहर के बनने से गरियाबंद, राजिम, नगरी के साथ ही मगरलोड, कुरूद तहसीलों के हजारों हेक्टेयर रकबे की सिंचाई संभव हो सकेगी, जो आज तक सुविधा की बाट जोह रहे हैं।

धमतरी। रूद्री बैराज से निकली सौ साल पुरानी ऐतिहासिक महानदी मुख्य नहर।

धमतरी। महानदी पर 1915 में बना रूद्री बैराज, जिसके अब निशान ही रह गए हैं। इसकी जगह नए बने बैराज ने ले ली है।

खबरें और भी हैं...