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दोष हटने से अपने आप जाएंगे गुण : स्नेहयशा
जैनसाध्वी स्नेहयशा मसा ने सोमवार को प्रवचन में कहा कि हमारी दृष्टि बाह्य रिद्धि को देखकर व्यक्ति का आंकलन करते हैं। एक दोष अगर निकल जाए तो अनंत गुणों का आविर्भाव होता है। गुण हमारे अंदर ही समृद्धि है, हमारी आत्मा का विकास है और दोष तो हमारे ऊपर से ओढ़ी हुई चादर है।
हमने दोष रूपी आवरण ऊपर से लगाया है और इस आवरण को हटाने की ताकत हममें ही है। दोष हटेगा तो गुण अपने आप प्रगटेगा। हमें गुणों को प्रगट करने में ज्यादा पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि ज्यादा पुरुषार्थ तो दोषों को दफनाने में, दोषों को हटाने में करना है। हम सोचते हैं कि दूसरों को क्रोध नहीं करना चाहिए पर जब स्वयं की बात आती है तो क्रोध, मान, माया सब चलता है। हम सोचते हैं कि हम बड़े हैं, समृद्धिशाली हैं इसलिए ये सब कर सकते हैं। मन कहता है मुझे गुण विकास में रस है और प्रभु कहते हैं मुझे गुण दृष्टि के विकास में रस हैं।
मन कहता है मुझे दोष नाश में रस है और प्रभु कहते हैं मुझे दोष दृष्टि नाश में रस है। गुणानुवाद के साथ गुणानुराग भी आवश्यक है। हमें हर व्यक्ति में गुण देखना चाहिए क्योंकि हर व्यक्ति में कुछ कुछ गुण होता ही है। पर हम सोचते हैं कि गुण मात्र हममें ही है। दूसरों का गुण, दूसरों की अच्छाई, दूसरों की मौलिकता हमें बर्दाश्त नहीं होती। गुणों के विकास के लिए हमें प्राथमिकता में गुणदृष्टि को रखना चाहिए। गुणदृष्टि के विकास में ही हमारी आत्मा का कल्याण है। संसार का कोई भी व्यक्ति, कोई भी पदार्थ सर्वगुण संपन्न भी नहीं है और सर्वदोष रहित भी नहीं है। हम हमेशा दूसरों को दोषी ठहराते हैं। हम सोचते हैं कि हमें क्रोध दूसरों के कारण आता है पर ऐसा नहीं है ये तो मात्र हमारी दृष्टि का दोष है। जब हमारी अपेक्षाओं पर कुठाराघात होता है तो हमें क्रोध आता है और जब हमारी अपेक्षाएं खत्म होगी तो भीतर का आनंद प्रगट होगा।
अगर हमने गुणदृष्टि का विकास नहीं किया तो हमारे भीतर जो गुण है हम उसके स्वामी नहीं बन पाएंगे। दोष दृष्टि का नाश करने से ही हमें मोक्ष प्राप्त होगा। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि मैं ही सच्चा हूं तो उसकी आत्मा का विकास नहीं हो सकता। हो सकता है कि उसका बाह्य विकास हो जाए पर आत्मिक विकास नहीं हो पाएगा। हम जिव्हा की गुलामी के कारण तप नहीं कर सकते। हमें माता-पिता की गुलामी पसंद नहीं आती पर जिव्हा की गुलामी स्वीकार